'यूज एण्ड थ्रो' का दौर.. 'यूज & थ्रो' का दौर

'सारी दुनिया मेरी मुट्ठी में' के अहं में इंसान ने अपनी ही दुनिया को संकीर्ण दायरों में बांध रख्खा है! हमारी सोच कुपमेंढक सी हो गयी है !अंतरिक्ष की टोह लेने वाले हम इंसानी दिलों की टोह लेना भूल गए है ! हिलमिल कर उत्सव मनाने वाले हम गैजेट्स के जाल में ऐसे खो गए है कि अपनी संतान से बतियाने के लिए भी व्हॉट्स ऐप मैसेंजर जरुरी हो गया है! सोशल मिडिया, एक मायावी दुनिया जहाँ 2 G हो 4 G, सभी पीढ़ियाँ सूरज के दर्शन भी करती है और हाथ हिला कर सूरज को अलविदा भी कहती है .... इंसानी 'इमोशन्स' के मायने है यहाँ 'स्माइली' .... वगैरा वगैरा ... है न! 
स्वार्थी इंसानों की मुट्ठी में दुनिया तो आ गई लेकिन मानवीय सरोकार, प्रकृति से इंसान का लगाव तथा जुड़ाव न जाने क्यों हथेलियों से फिसलते पानी की तरह दुनियादारी के खारे समंदर में खो गया है ! हर इंसान यहाँ गहरे दर्या के बीच में भी प्यासा ही प्यासा नजर आता है ! 
इस बनावटी जहाँ में एक तरफ रिश्ते, सम्बन्ध, सतही, दिखावटी और नकली होते जा रहे है वहीँ दूसरी तरफ वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद के इस दौर में 'यूज & थ्रो' का फंडा मानव के मन-मस्तिष्क पर जबरन कब्ज़ा कर रहा है! इंसान ने अपने स्वार्थ के लिए अब भौतिक सुखों की वस्तुओं के साथ-साथ इंसानों का भी उपयोग तथा उपभोग करना तथा उपयोगिता खत्म होने के बाद दूध से मख्खी की तरह निकाल कचरे में फेंक देना सीख लिया है ! 
मासूम युवा पौध को नफरत से सींच कर, इंसान और इंसानियत के खिलाफ जंग लड़ने को जिस तरह दुनिया भर में खड़ा किया जा रहा है उसे देख कर लगता है कि इंसान ईश्वर की सर्वोत्तम रचना नहीं बल्कि मजहबी, जुनूनी, कूपमंडूक लोगों के हाथ का खिलौना है जिसे वे मनचाहे ढंग से, मनचाहे काम के लिए इस्तेमाल कर मौत के कुएं में फेंक देते हैं यज्ञ में समिधा समझ कर!! 
जाने-अनजाने में इंसान आज 'मैं ' के घेरे में इस तरह जखड़ गया है कि उसे हर रिश्ता-नाता, पहचान-सम्बन्ध सिर्फ और सिर्फ सफलता, शोहरत और कामयाबी के शिखर तक पहुँचाने वाली सीढ़ी लगती है! शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचते ही ऊंचाईयों से हर चीज उसे अदना सी नजर आने लगाती है, फिर वह पति-पत्नी का जन्म-जन्मांतर का रिश्ता हो या पिता-पुत्र अटूट नाता ... माँ-बेटी का पवित्र बंधन या भाई-बहन का रेशमी रक्षासूत्र, गुरु-शिष्य का अनमोल जोड़ या यार-दोस्त का दिल से दिल का जुड़ाव !!
शायद हम भूल गए हैं .... दुनिया में जीने के मायने! एक-दूसरे के साथ , हाथ में हाथ लिए जिंदगी की कठिन डगर पर चलने के मायने!! मानव बन कर मानवता का परचम लहराते हुए आगे बढ़ने के मायने!!!
जीते-जी दूसरों के कन्धों पर सवार हो कर ऊंचाईयों को नापने के सपने किस लिए? सपनों को हकीकत में बदलते देख जिन आँखों कि पुतलियों में सपने पले-बढे, उन्हें ही अंधकार के हवाले कर रोशनी की बारात में शामिल होने के इरादे-अट्टहास किस लिए? 
आखिर रोते हुए आये थे इस जिंदगी में मगर स्मशान तक पहुँचने के लिए तो कुछ कन्धे चाहिए न? 

इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत खूब!
  • बहुत खूब.. दीप से दीप जलेंगे तो जीवन रोशन हो जायेगा! प्रेरणादायक सुन्दर प्रस्तुति!
  • बहुत बढियाँ प्रस्तुति
  • वाह! बहुत उम्दा!
  • बिल्कुल दिल को छू लेने वाली रचना