रक्षाबंधन

बड़ा मधुर रिश्तों का मधुवन, 
कुंजन में कोयल का गुंजन।
हर रिश्ते का अपना स्पन्दन, 
मृदु भावों का अनुपम चंदन।।

जब-जब बरसे रिमझिम सावन, 
हृदय सजे. बाबुल का आंगन।
याद सताए संग सखियों के झूले, 
भोला बचपन  कोई कैसे भूले।।

दादी अपनेपन से कथा  सुनाती,  
सुंदर सपनों की जाजम बुनती। 
भरी दुपहरी इमली चुन-चुनकर, 
मधुर-मधुर गीतों को गुनती।। 

खिला-खिला सावन मन भावन, 
बहना भाई का नेह बंधन पावन।
रेशम के कच्चे धागे का स्पदंन, 
बहता महका स्नेहिल अनुबंधन।। 

आया रक्षाबंधन का दिन पावन, 
खड़ी आज भैया भाभी के आंगन। 
भूले बिसरे वो स्वर्णिम जीवन पल, 
नैनों की नदियाँ में तिरते पलछिन।। 

माँ बाबा से पाया पावन रिश्ता, 
भाई -भावज मिले बन फरिश्ता। 
प्रीत पगा यह अनुपम अभिवंदन, 
रक्षाबंधन का हार्दिक अभिनंदन।।

शीला संचेती, कोलकाता।


द्वारा Sheela Sancheti
Shared09 Aug 2025
Start 09 Aug 2025
End 09 Aug 2030
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