१.
कानन करता गर्जना, सिंह चलाता राज।
कर शिकार खुद आप ही, निपटे भोजन काज।।
निपटे भोजन काज, मानता अपनी मरजी
चातक मस्तक साज, भेजता वर्षा अरजी।
ताल-तलैया देख, खोलता न कभी आनन।
विहग बड़ा खुद्दार, बून्द बिन भटके कानन।
२.
मोती बनकर ऐठती, स्वाति नक्षत्र बूंद।
धरती जोहे वाट रे, सोई आँखें मूंद।
सोई आँखें मूंद, रागिनी खग गण गाएं।
बदरी दौड़ी देख, पपीहा नयन लड़ाएं।
पहली बरखा बूंद, कमल दल पर है सोती।
चातक पीता सिर्फ, बूंद जो मुख में मोती।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।