वसंतोत्सव!
निशा ने फेंकी मखमली रजाई,
आँखें मलते-मलते ली प्राची ने अंगड़ाई ,
रेशमी, जरतारी, केसरिया चुनर लहराई,
छुई-मुई कलियों ने दी होले से मुंह दिखाई!
हड़बड़ी में ओढ़ दुपट्टा सुबह छत पर आई!
रश्मियों ने बिखेरा गुलाल, सृष्टि खिलखिलाई!
कलियों ने बुने सपने, सुन बसंत की सुगबुगाहट!
खुशनुमा बयारों ने खोले, पंखुड़ियों के घूंघट पट!
भंवरों ने चूमा अधरों को, देख गुलों की मुस्कुराहट!
परागकणों ने संजोए, सृजन के अमृत-घट!
कण-कण में सुधारस, पनिहारिनों से भरा पनघट!
धरती का अंग-अंग पुलकित, सृष्टि में वसंतोत्सव की आहट!
झूम-झूम डोलने लगी, खेतों में धान की बालियां,
आम्रमंजरी बहकी, महकने लगी मस्त-मस्त डालियां!
कुहुँ-कुहूँ बोले, आम्रवृक्ष पर कारी कोयलियां!
हरियाली कालीन बिछा, सुस्ताई धूल भरी पगदंडियां!
पल-पल रंग बदलता आसमां, क्षितिज पार जहाँ नया!
कश्तियों का जमघट, किनारों को चूमता दर्या!
प्रकृति पे चढ़ा खुमार, मनमीत, पौरुष युक्त मदन कुमार!
कामदेव का अवतार, छेड़ें रति के दिल के तार!
नवयौवना कर शृंगार, चली प्रियतम के अंतस-पार,
पहन प्रीत नवलखा हार, ढोए दो कुल लाज-भार!
अंग-अंग जले अंगार, यौवन का भड़का ज्वार!
कामदेव की चली कटार, रति डुबी हृदय- मंझधार!
ले वीणावादिनी का आशिष, चली लाडली प्रीतम देश,
ले संस्कृति, संस्कार की थाती, छोड़ मायका, चली परदेश!
वसंतोत्सव की मदमस्त बयार, बाबुल से लाया कागा संदेश!
ब्याहता की पहली होली, पधारो चैत्री गुलाब के देश!
चंपा, चमेली, पारिजात, वसंतोत्सव में दीपज्योति प्रकाश!
चांद सितारों से भरा-पूरा उम्मीदों का जगमग आकाश!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई|