हाउस वाइफ! किटी पार्टी चल रही थी...कोई किसी मल्टी नेशनल कंपनी में लिपिक थी तो कोई व्यवस्थापक...कोई बुटिक चलाती थी तो कोई स्कूल में पढ़ाती थी.. कोई डॉक्टर तो कोई सी ए! बारी-बारी से, कोई मटक-मटक कर, कोई गर्दन को झटका देकर तो कोई जुल्फों को पीछे करती हुई अपनी परिचय दे रही थी। 
अंत में बाकी थी श्रीमती शर्मा...वह न जाने क्यों झेंपती हुई, नजरें जमीं में गड़ा कर, धीमी सी आवाज में बोल रही थी..आंखे झुकी-झुकी और सिर धंसा-धंसा!
मैं अचंभित थी..क्या बात है?  पैसा, सुख-सुविधा सम्पन्न यह गृहिणी इतनी किस बात से लज्जित है? तभी वह धीमे स्वर में बोल पड़ी...
"मैं तो बस हॉउस वाईफ हूँ"
और किसी से नजरे मिलाएं बिना, नाश्ते की प्लेट उठा क़र एक तरफ चली गई...यह प्रसंग मेरे दिलो-दिमाग में रात भर किसी मेरी-गो-राउंड  की तरह अनवरत घूम रहा था! 

अधूरी नींद से उठकर पौ फटते ही काम में लगने वाली...घर वालों को उनकी पसंद का नाश्ता देने वाली..सुबह-सुबह बच्चों का टिफिन, पति के मोज़े-मोबाइल हाथ में थमाने वाली...पूरे परिवार का खाना बनाने वाली..जरासा आराम नसीब हुआ तो ठीक वर्ना अकड़ी कमर को बाम मल- मल कर वापस पल्लू बान्ध क़र रसोई में खड़ी होने वाली यह गृहिणी अपने आप को इतना हीन-दीन क्यों समझती है? 

बच्चों का पालन पोषण, साज-संभाल करना, उनसे वक़्त पर होम वर्क करवाना, सही और पोषक खाना पूरे परिवार को आनन्द और उल्हास के वातावरण में खिलाना और खुद बचा खुचा खाकर डकार लिए बिना ही सुबह की तैयारी में लग जाना..अपने बच्चों को प्यार की छाँव देना..कार्यस्थल से थके-हारे आए पति को पानी का ग्लास थमा क़र एक कोमल मुस्कान से उसका स्वागत करना क्या परिवार की बेहतरी के लिए आवश्यक नहीं है?

पढ़ी-लिखी माता जब बच्चों का लालन-पालन करती है तो वह बच्चों की जरूरतों को अच्छी तरह समझती है। बच्चों प्रेरित क़र दुनियादारी सिखाना, संस्कारों की जमा पूंजी देकर कामयाबी के रास्ते पर अग्रेसर करना क्या मामूली काम है? पति की थकान मिटाना, उसके गम और परेशानियोंको बाँट कर उन्हें हल्का करना क्या आसन हैं? फिर क्यों उसे गृहिणी कहलाने में शर्म महसूस हो रही है?

वो महिलाएं जो घर और बाहर का कामकाज संभालती हैं, वो कहीं न कहीं कुछ न कुछ खो देती हैं! घर के अन्दर-बाहर में दोनों जिम्मेदारियाँ संभालना, ऊँचाई पर तन कर बँधी रस्सी पर चलने से कम नहीं होता। दिन भर बच्चे माँ बाप की शक्ल देखने के लिए भी तरसते हैं..पूरा दिन न तो अपनी बात किसी से शेयर क़र सकते हैं न मनचाहा ताज़ा खा-पी सकते हैं। उनके नसीब में होता हैं वहीँ फ्रीज में पड़ा बासी खाना...जंक फ़ूड.. वगैरा-वगैरा! 

जिन्हें मज़बूरी में घर से बाहर काम के लिए जाना पड़ता हैं उनकी बात ठीक हैं..उनके पास विकल्प नहीं है मगर अगर विकल्प हैं तो ऐसा काम तरीका ऐसा चुनिएं कि घर भी संभाला जा सके और काम भी किया जा सके ताकि परिवार में अर्थार्जन भी हो!
मैं न तो नारी के अस्तित्व, पहचान को खोने की बात कर रही हूँ न उसके हुनर को परदे के अन्दर रखने की! मैं तो सिर्फ इतना ही सोचती हूँ कि   जब नारी घर में होती है, तो एक भावनात्मक सहारा  होता है परिवार के लिए और मजबूत जोड़ भी होता रिश्तों के लिए! जब नारी घर से बाहर चली जाती है, भले ही लक्ष्मी की कृपा बढ़ जाती हैं मगर गृहलक्ष्मी की कमी खलती है। बहुत कुछ आगे बढ़ते-बढ़ते पीछे छुट जाता हैं जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता।

वह नारी जो घर में रह कर, घर संभाल कर देश के भविष्य का निर्माण करती है वह कामकाजी महिला की तुलना में कमतर नहीं बल्कि कुछ सवा सेर ही है क्यों कि वह अपनी महत्वाकांक्षा, पहचान को अपने घर की समृद्धि, प्रगति में समाहित करती है और अपनी आशा आकांक्षाओं को अपने अंश में फलते-फूलते देखती है। वह परिवार के सपनों को परिवर्तित करने में मदद करती है... पूरी ईमानदारी से...फिर वह खुद को हीन-दीन क्यों समझे? हर काम का मूल्यांकन सिर्फ पैसे से तो नहीं होता है न....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।



इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।
  • वाह! बहुत सुन्दर