चंदा मोहे न सोहे इस तन्हाई में

चंदा मोहे न सोहे, इस तन्हाई में
लौटा दे तू उसे, इस जुदाई में 
कर दे कम दूरी मेरी...
या रख ले तू परछाई में...

रात के उनींदे है, विरह में छुपाए हैं
ये दर्द दिल के सारे, क्या रुलाए हैं 
अश्क जैसा हल्का जो, ग़म में ये जो भारी है 
लगता है कोई अपना है जो, साँसों पर आरी है 
जी सकूँ मैं किस तरह 
ले गया जो मन मेरा. आ.. आ..
चंदा मोहे न सोहे, इस तन्हाई में 
लौटा दे तू उसे, इस जुदाई में 
कर दे कम दूरी मेरी...
या रख ले तू परछाई में...

फिर मिलूँ उससे कभी ,आस लिये बैठी हूँ 
मिल जाए वो मुझे, दुवाएँ यही मैं करती हूँ 
हर जगह अब वो नज़र, ख़्वाब बनकर आता है 
बोझिल लगते हैं सफर, तू ही मुझको भाता है 
उसके बिन मैं कैसे रहूँ
ये दर्द- ए दिल कैसे सहूँ.. ऊं ऊं..
चंदा मोहे न सोहे, इस तन्हाई में 
लौटा दे तू उसे, इस जुदाई में 
कर दे कम दूरी मेरी...
या रख ले तू परछाई में...


मनोज कुमार यकता 

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