लक्ष्मी जी के अमृत कलश के सिक्के भले ही हमारे शिक्षकों, गुरुजनों पर न बरसते हो पर माँ सरस्वती की वीणा का संगीत उनके घरों में गुंजता था! गाँव, ढाणी, गली-कूचे में उनकी छड़ी की तूती बोलती थी! अभिभावक बच्चों को उन्हें सौंप कर निश्चिन्त हो जाते थे! गुरुजन भी उन्हें कतही निराश नहीं करते थे! अपने शिष्य को अपने बच्चों से भी ज्यादा प्यार करते थे.. कभी लाड़ लड़ाते तो कभी डांटते-डपटते भी थे! मैं किस्मतवाली थी कि मुझे कभी उनकी छड़ी का सामना नहीं करना पड़ा! मैं पढ़ाई में अच्छी थी इसलिए मुझे पहली कक्षा से सीधा तीसरी कक्षा में प्रवेश दिया गया! इसी समय मेरे परदादाजी आँधी की चपेट में आ गए और सब्जी मंडी में गिरे एक बड़े वृक्ष तले दब गए! लोगों ने उन्हें घर तक पहुँचाया पर ज्यादा दिन तक वो पोते को सेवा का मौका नहीं दे पाएं! मृत्यु के बाद की रस्मे निभाने के लिए माँ-बाबुजी को सुदूर राजस्थान के गाँव को जाना था! उन्होंने मेरी जिम्मेदारी मेरी शिक्षिका घोड़के बाई को सौंप दी और वो गाँव जाकर अपना कर्तव्य निभा आएं!
सोलापुर के श्राविका आश्रम स्कूल में लड़कियों के हॉस्टल की भी सुविधा थी! जैन साध्वी द्वारा संचालित नामचीन स्कूल के इस होस्टल के नियम सख्त थे! घोड़के बाई रोज मेरे लिए गर्म पानी की व्यवस्था कराती, खाने के समय मेरा खास ध्यान रखती और अपनी बच्ची सा मुझे अपने पास सुलाती! सात-आठ साल की कोमल कली मैं सबसे छोटी विद्यार्थिनी थी होस्टल की!
उम्र की ढलान पर भी ये यादें मन-मस्तिष्क के कैनवास पर इंसानियत का सुन्दर मंजर रेखांकित करती है और ईश्वरीय शक्ति में विश्वास को सुदृढ़ करती है!
पिता सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर होने के कारण उनका महाराष्ट्र में तबादला होता रहता था!
इस मायने में बहुत भाग्यशाली हूँ मैं कि मुझे जीवन में ऐसे कई गुरुजनों का आशीर्वाद प्राप्त हुआ जिन्होंने मेरे जेहन में अपनी अमिट छाप छोड़ दी और जब तक धड़कनें चलती रहेगी, ये स्मृतियाँ हमेशा ताज़ा रहेगी!
कैसे भूल पाऊँगी मैं इन शिल्पकारों को जिन्होंने छेनी से ठोंक-ठाक कर मेरे व्यक्तित्व को घड़ा, कोयले की खदान से निकले हीरे को तराशा, लहराते थान सम जीवन को करीने से बेंत कर सुन्दर परिधान में परिवर्तित किया, नैतिक मूल्यों का मोल खुद के आचरण, विवेक-व्यवहार से समझाया! मंझधार में फंसी जीवन-नैया को दीपस्तम्भ सा दिशा निर्देश दिया और मंजिल तक पहुँचाने में अपना अमूल्य योगदान दिया! ह्रदय की अनन्त गहराईयों से नमन मेरे सभी परमपूज्य गुरुजनों को 🙏🙏
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |