भाग ६०
अप्पा ने विनय के पिताजी वीर बहादुर थापा जी को फ़ोन कर उन्हें भूमिपूजन के कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया। विनय के पिता बहुत ही भावुक हुए। उन्हें इस बात की बहुत ख़ुशी थी कि यशवंतराव जी उन्हें भूले नहीं बल्कि उन्होंने शुभकार्य के लिए सपत्निक आमंत्रित किया! उन्होंने विनय की माताजी राजरानी से भी बात क़ी। पद्मावती जी ने भी दोनों का हालचाल पूछा और मंगल कार्य पर दोनों को आने का तहेदिल से निमंत्रण दिया। पिछले कार्यक्रम के बाद उनकी सब से अच्छी पहचान हो गई थी! सभी से उनका व्यवहार बहुत ही गरिमामय तथा शालीन था। मित्र-मण्डली के अभिभावक उनसे अभिभूत थे मगर कुछ मजबूरियाँ थी इस बार उनकी कि वह इस कार्यक्रम में चाह कर भी नहीं पहुँच सकते थे। उन्होंने हॉस्पिटल के उद्घाटन पर आने का वादा किया और सभी का शुक्रिया अदा किया।
थापा दंपत्ति ने वैदेही को भी ढेर सारी बधाइयां प्रेषित की। उन्होंने 'युवा स्पंदन' का पूरा कार्यक्रम भारतीय चैनल पर लाइव देखा था। उनका दिल वैदेही को देख बाग-बाग हो गया था। थापा दंपत्ति ने पदमावती जी को वैदेही तक बात पहुंचाने को कहा और कार्यक्रम में आने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर क्षमा भी मांगी।
सुदूर दो देशों के बाशिंदो का यह आपसी प्यार 'दिन दूना, रात चौगुना' हो रहा था मानों सोलह कलाएं दिखाता शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा! आखिर भारतीय संस्कृति, सभ्यता की अमिट छाप से कैसे अछूता रह सकता था हमारा सदियों पुराना यह पडोसी देश?
विभा को आज कुछ खास टिप्स मिलने वाले थे नितीन सर से! कल ही रात को लौटे थे वो। थोड़ा आराम कर वह दोपहर को बैडमिंटन कोर्ट पर आने वाले थे। इस बार के राष्ट्रीय खेलों का आयोजन महाराष्ट्र के थाने में होने वाला था। परसो राष्ट्रीय खेलों के महाकुम्भ का उदघाटन समारोह था। विभा ने वीणा को फ़ोन किया और पांच मिनिट बाद घर के बाहर आ कर खड़े रहने को कहा। अप्पा ने ड्राइवर को विभा को कॉलेज छोड़ने के लिए कह दिया था। नियत समय पर वह गाड़ी लेकर आ गया और विभा चल पड़ी कोर्ट की ऒर।
अपने खेल को तराशने के लिए यह इस साल की चयन स्पर्धाओं के लिए आख़री मौका था। दोनों 'वार्म अप' हो रही थी तभी नितीन सर की आहट पा कर दोनों सचेत हो गई। सर ने दोनों को सामने की तरफ जाने को कहा और दूसरी तरफ वो अकेले ही उन्हें सर्विस डालने लगे। अभी भी कुछ तालमेल की कमी थी दोनों में। कई बार दोनों एक ही जगह आ जाती थी और तू..तू.. मैं..मैं की दुविधा में दोनों चूक जाती थी और शटल बीच में ही गिर जाता था।
नितीन सर ने दोनों को बाहर बुलाया और आपसी समझ की कमी पर चेताया। एक-दूसरे को आगे बढ़ने या रुकने का इशारा करने को भी कहा। वक़्त कम था। स्पर्धा की चुनौती मुँह-बाएँ खड़ी थी। दोनों ने हर सुझाव को ध्यान से सुना और दोनों उसे अमल में लाने के लिए उतावली हो गई थी।
सर ने कल तीन बजे सभी प्रतिभागियों को कॉलेज में बुलाया था। कल उन्हें जर्सी वगैरा दी जानी थी। विभा को आज यश की बहुत याद आ रही थी। परसो से 'राष्ट्रीय खेल कुम्भ' का शुभारम्भ था और विभा को महाराष्ट्र का ध्वज लेकर अपने सभी साथी खिलाड़ियों का नेतृत्व करना था।
आज यश का भी चयन स्पर्धा का पहला सत्र था। आज अगर उसका चयन होगा तो फिर अगले सत्र के लिए उसे गौरव सर की अकादमी में जुड़ने के लिए आमंत्रित किया जाने वाला था। अगला सत्र पंद्रह दिन के बाद शुरू होने वाला था। विभा ने यश को विडिओ कॉल लगाया। यश तैयार हो कर कोर्ट पर पहुँच चूका था। यश के साथ-साथ विभा को भी अनुशासन का पूरा खयाल था। विभा ने उसे शुभकामनाएं दी और फ़ोन कट कर दिया। वह जानती थी यह सही समय नहीं हैं फ़ोन पर बतियाने का लम्बी लबी बातें करने का।
वज्र और वैदेही ने दोपहर को ही यश को शुभकामनाएं दी थी और बहुत सी बातें भी की थी। उन्होंने बताया था यश को कि विभा कॉलेज में गई हैं बैडमिंटन खेलने के लिए। उसे पता था 'झाँसी की रानी' एक बार फ़ोन जरूर करेगी और हुआ भी वैसे ही। दोनों ने एक-दूजे को शुभेच्छा दी और लक्ष्य को पाने की कोशिश में जुट गएं!
यश के लिए आज जबरदस्त चुनौती थी। दुर्घटना के बाद बदले हालात में वह पहली बार किसी महत्वपूर्ण चुनौती से दो-दो हाथ करने जा रहा था। सामने का खिलाडी एक अनुभवी खिलाडी था। दो साल से वह गौरव सर से प्रशिक्षण ले रहा था। गौरव सर के कोचिंग का जलवा चार दिन में ही यश देख चूका था। दो पैरालिंपिक में तमगों की बरसात करनेवाले इस खेल में अब भारतीयों की रूचि बढ़ चुकी थी। यह गर्व और अभिमान की बात थी कि गौरव सर की अकादमी के ही सभी खिलाडी थे और उनके कोच भी गौरव सर ही थे। यश पूरा जोश से भरा हुआ था। उसने अपने स्टेमिना को बढाने की भी पुरजोर कोशिश की थी तथा उसमें सफलता भी पाई थी।
यश की मैच के लिए पहला कॉल दिया जा चूका था। यश ने शूज, रैकेट चेक किए। अपनी नैपकिन को बैग से निकाला और मुँह पर थोड़ा पानी मार उसने एक घूंट पानी पिया और पैरों को रिलैक्स करने लगा। अपने कृत्रिम पाँव की पोजीशन को चेक किया। अब दूसरा कॉल आ चूका था और तीसरे कॉल पर कोर्ट पर उतरना था। गौरव सर ने दोनों को शुभकामनाएं दी, पीठ थपथपाई और कोर्ट के बाहर कुर्सी पर बैठ गए।
टॉस हुआ और यश ने सर्विस चुनी। अम्पायर ने खिलाडियों को अलर्ट कर गेम शुरू किया। यश अपना सब कुछ दाँव पर लगा चूका था। दर्द को तो यश ने अपने जीवन-शब्दकोष से मानों निकाल फेंक दिया था। यश ने अच्छी सर्विस और नेट पर खेल कर बढ़त बना ली थी। पहला सेट यश ने जीत लिया था अब दूसरा सेट जीतना जरूरी था। यहाँ दमखम का भी बहुत बड़ा रोल था। दूसरे सेट में सामने वाला प्रतिद्वंदी हावी हो रहा था लेकिन यश ने अपनी सर्विस और शॉट्स के बल पर दूसरे गेम को भी अपने नाम कर लिया और सीधे सेट्स में जीत हासिल कर जीत की वरमाला स्वयं पहन ली।
गौरव सर उसे बधाईयां देने उसकी तरफ बढ़ ही रहे थी कि यश गिर पड़ा। उसके पैर से खून निकल रहा था। सामने खड़ा उसका प्रतिद्वंदी भी दौड़ कर आया और दोनों ने उसे अस्पताल ले जाना उचित समझा। डॉक्टर ने बैंडेज कर उसे चेक कर कहा, चिंता की कोई बात नहीं हैं। जरुरत से ज्यादा जोर पड़ने तथा घाँव होने से खून बहने लगा हैं। ज़ख्म दो-चार दिन में भर जायेगा।
अब तक यश कुछ संभल चूका था। गौरव सर पास ही खड़े थे। वह उसकी संघर्ष क्षमता से बहुत प्रभावित हुए। शायद उन्हें ऐसे ही शिष्य की आवश्यकता थी। गौरव सर के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। उन्हें इन युवाओं के कृत्रिम अंगों के साथ तालमेल बैठाने में ही बहुत मशक्कत करनी पडती थी। वो खुद इस पीड़ा को जी चुके थे सालों पहले। ऐसे कठिन समय में ही तो खिलाडी की सहनशक्ति, जीवट, जद्दोजहद, जिद्द और लगन की असली पहचान होती हैं। यश उनकी हर कसौटी पर खरा उतरा था सौ टंच सोने सा।
गौरव सर ने यश को सिलेक्शन की बधाई दी, अपने अकादमी को ज्वाइन करने का न्योता दिया और आराम करने को कह कर, हॉस्पिटल की सिस्टर को कुछ सूचनाएँ दे कर वो यश को 'गुड नाईट' कह कर चले गए।
थोड़े समय बाद नितीन सर का कॉल आया। उन्होंने यश को ढेरों बधाइयां दी और आराम करने को कहा। उन्होंने उसकी भूरी-भूरी प्रसंशा की और कहा ,' यश! तुमने मेरे विश्वास को पक्का किया हैं। बहुत बहुत अभिनंदन जाँबाज। तुम्हारा चयन हो गया हैं। तुम्हारा भविष्य उज्जवल हैं! वेल डन माय बॉय! वेल डन "
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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