शीर्षक : बाराती...
मतलबी जहाँ में कौन है ग़म का साथी?
अर्श से फर्श पर साथ छोड़ गए बाराती!
विरले ही हैं पतझड़ में शाख से जुड़े राही!
तिमिर में साया भी नहीं हमसफ़र-हमराही !
गमों की आँधियों में बुझे सब जलते दीए,
किसे फुर्सत आँसू बहाएँ हारे हुए के लिए!
वक़्त आता रहेगा, जाता रहेगा मौसम सा,
इन्सान परखा जायेगा इम्तिहान में छात्र सा!
खिले-खिले फूल साँझ होते ही मुरझायेंगे,
बुलंदियों पर खड़े बन्दे कल तन्हा हो जायेंगे!
जाग-जाग अल्लाह के बन्दे न कर तू गुमान!
चार दिन की चाँदनी, फिर अंधेरें ही मेहमान!
अपनों की भीड़ में 'अपने' को बन्दे पहचान!
'ग़म के साथी' का भूलना न राही एहसान!