शीर्षक : नवपल्लव...
दर्द मिटते नहीं दफनाने से,
घाँव भरते नहीं छुपाने से,
अनदेखी कुरेदती है जख़्म,
ताउम्र भरते नहीं प्यार-मनुहार से.....
उलझने न दो धागे प्यार के...
गांठ पड़ जाएगी रेशमी रिश्तों में!
टेढ़ी-मेढ़ी बुनाई हैं रिश्तों की...
न खींचो न उधेड़ो उन्हें जोश में!
सर्द रातों में उभरती है सिहरन ,
गलाती हड्डियाँ या तन-मन!
पतझड़ में शाख से बिछड़ना पत्तियों का ,
मार्ग प्रशस्त करें नवपल्लव का!
उबलने न दो दर्द का लावा,
जागृत ज्वालामुखी जलाएगा जहाँ!
राख में तब्दील करेगा हर सपना ....
दम तोड़ देगी मलबे तले उम्मीदें!
दर्द मिलजुल बाँटना सीखो,
कोहरे में सूरज सा धैर्य रक्खो!
रात के गर्भ में पल रहा दिनकर,
अरुणोदय में अटूट विश्वास रक्खो!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा