बिनब्याही माँ भाग 3 त्योहारों का मौसम ख़त्म होने को था और खेल के महाकुम्भ की तैयारियाँ शुरू हो चुकी थी! महाविद्यालय की वाणिज्य शाखा 3-4 साल पहले ही शुरू हुई थी और इंजीनियरिंग, फार्मेसी की तरह वाणिज्य में भी सीमित लड़कियाँ थी!
महाविद्यालय के प्राचार्य नवाचार को अपनाने के लिए प्रसिद्ध थे! सिर्फ सांस्कृतिक, साहित्यिक स्पर्धाओं में कॉलेज के खिलाडी अग्रणी नहीं थे बल्कि खेल के क्षेत्र में भी वो अपना झंडा गाड़ चुके थे!
आसपास के गावों के लिए यहीं महत्वपूर्ण शिक्षा का केंद्र था! रश्मि अंतरमहाविद्यालयिन महत्वपूर्ण स्पर्धाओं में भाग लेकर अपने व्यक्तित्व को निखारना चाहती थी, बहुँआयामी बनाना चाहती थी! खेल उसका पहला प्यार था! कबड्डी की प्रैक्टिस करते-करते उसे न समय का भान रहता था न खाने-पिने का! 
जब भी उनकी टीम मैदान में उतरती, आसपास खेल प्रेमियों की भीड़ जमा हो जाती! रश्मि के कोच हमेशा कहते, ' खेल पर बहुत सारे कारक प्रभाव डालते हैं जिसमें चेरिंग का भी महत्वपूर्ण योगदान होता हैं! '
रश्मि कभी 'कार्नर' संभालती और सुरक्षा कवच को मजबूती देती तो कभी प्रतिद्वन्दी के क्षेत्र में अंदर तक घुस कर अपनी टीम के लिए अंक हासिल कर लाती! उसकी 'कार्नर' से मारी गई डाइव इतनी सटीक होती थी कि प्रतिद्वंदी खिलाडी हिल भी नहीं पाती थी! 
खेल ही था जिसने रश्मि को भीड़ में अकेले भी अपने विचारों पर वटवृक्ष सी मजबूती से डट कर खड़े होने का हौसला दिया था! सब को साथ लेकर चलना, लक्ष्य पर नज़रे गढ़ाये रख कर जीत की वरमाला पहनने की जद्दोजहद में लगे रहना, प्रतिपक्ष के घर में घुस कर उन्हें नेस्तनाबूत कर विजयश्री का वरण करना उसने 'कबड्डी' से ही सीखा था!
न जाने क्यों आज उसका खेल में मन नहीं लग रहा था! दो-तीन दिन से वह दर्शकों में से जिस आवाज़ को सुनने को आतुर थी वह उसे सुनाई नहीं दे रही थी! देर तक तालियाँ बजाने का हुनर और पागलपन आज गायब था दर्शक दीर्घा में से....न जानें क्यों?
उसने चुपके से भीड़ की ऒर देखा! वो आँखें जिन्हें वो ढूंढ रही थी वह न जाने क्यों नदारद थी! रश्मि की दीवानगी भी कहीं लुप्त हो चुकी थी! 
तभी चढ़ाई पर आई खिलाडी की जांघो को देखकर वह सुनहरा मौका जान कर एकाग्र हो गई... अगले ही पल उसने अपने डाइव से उसके पैर को जखड़ दिया और प्रेक्षकों की भीड़ से एक बुलंद आवाज़ फ़िजा में गुंजी! 'वेल ड़न'....बोल्ड & ब्यूटीफुल!
रश्मि की अनछुई पांखे कमलदल सी खिल गई! जिस शंखनाद को वह सुनने को तरस रही थी उसको सुनते ही वह अकल्पनीय जोश से भर गई.. कुछ ही पल में जीत का सेहरा पहन उसकी टीम अपना सामान समेटने लगी और वह अपने बेलगाम मन को..
वह अजनबी,  'हैंडसम' उसकी ज़िन्दगी का अटूट हिस्सा बन चूका था और उसकी धड़कनों पर एकछत्र राज कर रहा था! रातें उसके सपने देखने में गुज़र जाती और दिन में नज़रे उसे जर्रे-जर्रे में ढूंढने में! आँखों-आँखों में, इशारों-इशारों में बातें करने का दौर अब अपने अंतिम पड़ाव पर था और दिल से दिल के तार जुड़ने को आतुर थे!
जेसीका, उसकी प्रिय सहेली..हमराह, हमराज़... शायद रश्मि के मन को पढ़ने का हुनर जानती थी और  उसके मन में ज्वार-भाटा सी उठती लहरों की मंजिल का ठौर उसे पता था!
अपनी सखी की यह स्थिति देख उसने अंत में कह ही दिया... "यार... इतनी भी क्या जल्दी? जरा फूँक-फूँक कर कदम बढ़ा..मेरे चचेरे भाई का खास मित्र हैं वह यार! बोल.. क्या ट्रीट देगी अगर मैं उससे कल तुम्हें मिला दूँ तो..."
रश्मि को मानों चाँद पर ठौर मिल गई थी...वह सपनों की वन्दनवार सजाने में व्यस्त हो गई.. एक-एक पल उसे युगों-युगों सा प्रतीत हो रहा था...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
शेष अगले भाग में....


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