अजीब रिश्ता हैं माँ-बेटी का....

अजीब रिश्ता हैं माँ-बेटी का,

मानों दुध में घूली मिश्री सा!

नाळ से टूटी पर दिल से जुड़ी,
मन के आवर्तों से जुड़ी कडी-कडी,
आंगन में बहती खुशनुमा बयार!
धडकनों संग बजती मधुर गिटार!
देहरी पर जलती दीए की ज्योति,
स्नेह से नम कोमल कपास-बाती!
माँ के सपनों की मूर्त कल्पना!
आंगन में सजी रंगबिरंगी अल्पना!
पीहर के वृक्ष पर सजी आम्रमंजरी!
बाबुल की फिज़ा में रस उंड़ेलती गगरी!
नि:शब्दता को पढ़ती, माँ की लाड़ली!
धूप-छांव में गुड़ की मीठी डली!
कल-कल बहता प्रीत का निर्झर! 
दु:ख या सुख में बहे आंसू झर-झर!
माँ के लिए फौलाद की ढाल-तलवार!
दुश्मन के लिए एकलव्य का अचूक वार!
माँ का अक्स, दरारों की मरहम पट्टी!
माँ की दुनिया, प्यारी-प्यारी बेटी!
दो घर का भार, हंसते-हंसते उठाती!
हाथों के छाले, पैरों की दरारें, अपनों से छुपाती!
फूल सी कोमल, पंखुड़ियों सी नाज़ुक,
वक़्त की ललकार पर, उठाती चाबुक!
माँ का जिसमें सदा बसा है, तोते सा प्राण,
माँ में अटके रहे ससुराल में बेटी के प्राण!
 
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई, महाराष्ट्र
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

 
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