भाग ३२
जैसे-जैसे महाविद्यालय के वार्षिक उत्सव की तारीख नजदीक आ रही थी वैसे-वैसे सभी अपने-अपने संवाद रटने में लगे थे! विभा ने बंदरिया का रूप धारण करने के लिए इंटरनेट पर सर्फ़ कर ऑनलाइनअपनी कल्पना के ढांचे में बैठा बंदरिया का मुखौटा ढूंढ़ कर आर्डर कर दिया था। बंदरिया को वास्तविक रूप देने के लिए विभा ने हल्के ग्रेनाईट के रंग का फर का जाकिट मंगवा दिया था! पूंछ के लिए बहुत सारे पर्याय थे। विभा की तैयारी जोरों पर थी। कहानी को धाराप्रवाह आगे बढ़ा कर उसे प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करने की कोशिश में वह दिलोंजान से लगी हुई थी!
विनय की कमी उसे बार-बार खल रही थी। इतने दिनों में विनय होता तो उसे दस बार टोक दिया होता! बात-बात पर लगड़ते-झगते और बाद में जो छेनी से ठोंक-ठाक शिल्प तैयार होता वह लाजवाब होता! अभी तो उसे सबकी राय लेनी भी बाकी थी। यह उत्साहवर्धक बात थी कि विनय के माता-पिता भी इस कार्यक्रम में शिरकत करने वाले थे! उनकी फ्लाइट की टिकिटस बुक हो चुकी थी और सभी बेसब्री से उनका इंतज़ार कर रहें थे, खास कर वज्र के पिता आबा! उन्हें पूरा विश्वास था कि वज्र को देख कर उनके काष्ठ से जल कर कोयला हो चुके मन के खदान में इक्का-दुक्का हीरे को पाने की उम्मीद जगेगी! अपना सब कुछ खो चुके इन अभिभावकों की मन की तप्त भूमि पर युवाओं की छोटी सी कोशिश ठण्डी फुहारों सी महसूस होगी।
यह नुक्कड़-नाटक इस मित्र-मण्डली के लिए जीवन की कश्ती को उफनते समंदर में फिर से उतारने का, झंझवातों से फिर डट कर भिड़ने का बहाना बन गया था। उन्हें अपनी खोई हुई जीवन-ऊर्जा पाने का, खुद को शाबित करने का एक बेहतरीन मौका दे रही थी किस्मत और ये 'युवा ब्रिगेड' उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी!
विभा सिर्फ हिन्दी में महारत ही हासिल नहीं कर रही थी बल्कि अपने अंदर कसमसाते विचारों को अभिव्यक्त करने का कोई भी सुनहरा मौका हाथ से जाने देना नहीं चाहती थी! अनुभव के गुल्लक में जमा हुएँ सिक्के अब वह समाज-प्रबोधन, जन-जागरण के नेक काम में खर्च करना चाहती थी!
संवादों के धागों को गुंथ कर उसने एक प्रभावी नुक्कड़- नाटक को ऊनी शाल का स्वरुप दे दिया था जिसके स्पर्श से सोई मानवता को भी नई ऊष्मा मिल सकें। हास्य और व्यंग का अद्धभुत मिश्रण इस नाटक का महत्वपूर्ण अंग था। इसी अगम्य नींव पर कामयाबी की अट्टालिका खड़ी करनी थी। 'युवा ब्रिगेड' सूरज से लुका-छुपी खेलने के मन बना चुकी थी और उसी जज्बे से आल्हादित थी।
विचारों के आवर्तों में गोतें लगाते-लगाते वह बदहवास भाग रही थी कि मोबाइल की घंटी बजी।
अप्पा बोल रहें थे, " विभा... बेटा! अभिनन्दन! आज स्वास्थ्य मंत्रालय से पत्र आया है। उन्होंने सभी कागजात, अस्पताल की प्रस्तावित रुपरेखा, अनुमानित खर्चका आकलन, अस्पताल के प्रस्तावित तथा अपेक्षित जमीन का विस्तृत ब्यौरा माँगा हैं और अनुमति के लिए निवेदन पत्र की प्रति तथा प्रस्तावित समय सीमा की जानकारी मांगी हैं ताकि इस पर मंत्रालय विचार कर अंतिम निर्णय ले सके! "
"विभा! काय म्हणतेस तू? देवाला साकडं घालं पोरी! माझं स्वप्न होईल न पूर्ण?"
"अप्पा! कल्याणकारी इच्छा हैं आपकी! क्यों पूरी नहीं होगी? आप तो निमित्त मात्र हैं अप्पा! सिद्धि विनायक की इच्छा हैं यह! जरूर पूरी होगी "
बेटी की आशवादी सोच से अप्पा बहुत खुश थे। यहीं वह सोच थी जिसने इन 'युवा ब्रिगेड' को इतने बड़े हादसे के बाद सामान्य स्थिति की तरफ अग्रेसर होने में मदद की थी।
अप्पा की तरह ही विभा दूसरों की मदद को सदैव तैयार रहती! बार-बार अपने विचारों के छूटे छोरों को पकड़ने के लिए भागते-भागते वह थक चुकी थी मानों एक माँ अपने शरारती बच्चे को पकड़ने की कोशिश करते-करते हाँप रही हो!
उसने लाली को आवाज़ दी। लाली ने आते ही खुद ही पूछ लिया, " जी ताई! चहा-नाश्ता आणू का? दुपार उतरली की... "
विभा ने हँसते हुए 'हाँ' कहा और उसकी ऒर देखती ही रह गई! अप्पा ने लाया हुआ पंजाबी ड्रेस उस पर बहुत जच रहा था! रंग साँवला जरूर था लेकिन शरीर पर श्रम का तेज था जो उसे आकर्षक बना रहा था अभी-अभी खिली नन्ही गेंदे की कली सा! बालों से आती नारियल तेल की खुशबू और लटकती दो चोटियां उसकी मासूमियत बयाँ कर रही थी! चाय और नाश्ते की प्लेट रख कर वह रसोई तरफ चली गई।
लाली के चेहरे के तेज, चंचलता और यौवन की दस्तक देते नव-उभारों को देख वह कुछ हद तक चिंतित भी हो गई! मन ही मन में पल-पल घर करती नकारात्मक विचारों की धुंद उसकी आँखों की पुतलियों में उभरती सुन्दर छवि को धुंधला कर रही थी।
"कोवळी पोर! मी बाहेर गेले की घरात एकटीचं !" बिजली से कौन्धते विचार से वह साशंकित हो गई लेकिन झट से उसने इस विचार को ऐसे झटका जैसे आटे की चक्की में बदन से आटा झटकता चक्कीवाला!
चाय की चुस्कियों के साथ ही दिमाग़ के घोड़े तेज रफ़्तार से दौड़ने लगे। रोज की पढ़ाई-लिखाई बाकी थी उसकी और लाली की भी! उसने व्याकरण की किताब को खंगालना शुरू किया और छन्द, अलंकार को विस्तार से पढ़ने लगी! कबीर जी के दोहे उसे बहुत अच्छे लगते थे! ज़िन्दगी के खट्टे तथा मलाईदार दही को मथ-मथ कर उस से नवनीत निकाल कर रख दिया हैं उन्होंने अपने दोहों में! कहाँ किताबी ज्ञान की वास्तविकता से दूरियाँ और कहाँ हर ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे के आम ज़िन्दगी को खंगालती कबीर की पंक्तियाँ! सीमित शब्दों के घट में समाहित जीवन का असीमित ज्ञान, जीवन की सच्चाइयाँ!
पढ़ते-पढ़ते कब सूर्य अस्ताचल की ऒर चला गया हो गई उसे पता भी नहीं चला। मोबाइल की रिंग टोन से उसकी भाव-समाधी टूट गई! यश का फ़ोन देख उसने लपक कर फोन उठाया!
"हे विश्वसुंदरी! किस काम में उलझी हो? तुम्हारे इस दीवाने की आवाज़ सुन रही हो?"
विभा मुस्कुराई और बोल पड़ी, " कहो प्यारे! क्या दिल चुराने का इरादा हैं? बहुत पहरे लगे हैं बच्चू इस दिल पर... "
दोनों कहकहें लगाने लगे! "यार विभा! कल बैडमिंटन खेलने जाते हैं.. मैं अपनी रैकेट और शटल का बॉक्स लेकर आता हूं... तू अपनी रैकेट लाना मत भूलना! ओ के? "
खेल विभा की जान थी ! ना कहने का तो सवाल ही कहाँ उपस्थित होता था? उसने बिना कोई नाज़ नखरें दिखाएँ सीधे हाँ भर दी और वहाँ से आएं फ्लाइंग किस को स्वीकार कर उसने मोबाइल दूर रख दिया...
पूरे दो महीनों के बाद वह यश के साथ कल कोर्ट पर जाने वाली थी...यादों का समंदर उछल पड़ा था.. सैकड़ों लहरें किनारे की तरफ दौड़ती आ रही थी और मानों उसके चरण चूम कर वापस समंदर की गहराइयों में लौट रही थी.. मन में एक ही प्रश्न उछल-कूद मचा रहा था... क्या यश फिर से खेल पायेगा 'जयपुर फुट' के साथ?
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में.....