चौपाई
चोरी कर बच निकला बन्दा।
बढ़ चढ़ कहता दे दो चन्दा।
कोतवाल खुद फिर कैसा डर।
राम नाम का हूँ सौदागर।।
अंदर-बाहर दूषित आनन।
कलियुग का मैं भ्रमित दशानन।
नरक लोक वासी मेरा तन।
राम जन्म स्थल है अति पावन।।
सेवक मन्दिर का मैं न्यारा।
प्रभु से ज्यादा पैसा प्यारा ।
सोना,चाँदी, रुपया, पैसा।
भक्तों से आस्था-छल कैसा।।
कसम राम की खाता यारो।
भोले भक्तों को प्रभु तारो।
कलुषित मति से बाधित मानव।
दण्डित कर दो सब खल-दानव।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।