आईना है दोस्त....
शीर्षक : आईना है दोस्त...
 
आईना है दोस्त मेरा, दोस्त मेरा आईना!
खरी-खरी कहे भले झूठों को ये भाए ना!
 
कमियाँ, कमजोरियाँ छुपाएँ ना छुपे रे मना,
बेबाक़, बेखौफ़, बेमिसाल दोस्त है आईना!
 
वक़्त हो या ऋतु, पल-पल मिजाज़ नया-नया 
आईना और दोस्त मेरा ढूंढे न साथी नित नया!
 
निभाए वादा, दिल से करे सब से दुआ-सलाम,
स्वार्थ में न बेचे ज़मीर, दे ख़ुदा का पैगाम!
 
सत्य पे रहे अडिग, सत्य का करे सम्मान,
आलोचना अनसुनी कर रक्खे संयम-भान!
 
धूल की परतों तले धुंधली तस्वीर छुपी भारी,
भूलना न दोस्त मेरे, ये जिंदादिली, ये यारी!
 
वक़्त की बेरहमियों में दोस्ती लगे खारी,
डटकर रहना दोस्त, इम्तिहान है जारी हमारी!
 
अंधियारी रातें या दैदिप्यमान हो सितारें,
शीशे सा पाक-साफ़ हो दिल, दोस्त प्यारे!
 
दाग-धब्बे भले चेहरे पे या स्वेद की हो बुँदे,
लक्ष्य-ध्यास अटल-अटूट, ख़ुदा के हम बन्दे!
 
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |
 
 
 
 
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर कविता लिखी है। मैं आपकी लेखनी की सराहना करता हूँ।
  • बहुत अच्छा लिखा है
  • बहुत खूब....
  • क्या खूब लगती है, बड़ी सुन्दर दिखती है ❤️❤️❤️❤️
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  • लाजवाब ❤️🙏❤️🙏❤️
  • बहुत खूब वीणा जी! पुरानी स्मृतियों में आँसू और मुस्कान का इंद्रधनुषी जलवा नज़र आता हैं।