कृतज्ञता हमारे भारत देश में अनेकानेक त्योहार सपरिवार तथा मित्रों के साथ मनाये जाते है जो हमारी संस्कृति, सभ्यता को दर्शाती है | जितने त्योहार हमारी भूमि पर मनाये जाते है उतने शायद कहीं ओर मनाये जाते होंगे | रक्षाबन्धन हो या भाईदूज जो भाई बहन के रिश्ते में अटूट विश्वास बनाता है, चाहे अन्य त्योहार जैसे नवरात्रि, दिवाली या होली ऐसे बहुत ही त्योहार हम बंधुत्व से मनाते है और यही हमारे देश की खूबी है |
माँ.. माँ.. मुझे समझ नहीं आता ये विद्यालयों की परिक्षा हर बार इतनी देर से क्यों खत्म होती है.. ध्रुव ने अपनी माँ से कहा |
क्यों रे, ऐसा सवाल क्यों उठाया बात क्या है, तुझे परीक्षा देनी भी है या नहीं ?
देनी है ना, लेकिन इतनी देर से नहीं, क्या वो नहीं समझते कि हम बच्चों को दिवाली के लिए मामा के गाँव जाने की कितनी बेसब्री होती है. । 
अच्छा तो ये बात है बदमाश, वैसे तुम्हें छुट्टियां तो बहुत मिलेंगी तो इतनी बेसब्री क्यों? .. 
माँ तुम भी मेरी बात नहीं समझती, जा मैं तुझसे बात नहीं करता.. कहते हुए ध्रुव ने अपना मुंह फेर लिया |
उसकी गाँव जाने की होड़ वह बखूबी समझ गईं  और कहने लगी,' अगर विद्यालय तुम्हें जल्दी छुट्टियां देने लगी तो फिर तुम्हारे मन में गाँव जाने की उत्सुकता रहेगी क्या? .. 
माँ का सवाल सुन वह माँ से लिपट गया और कहने लगा, तुमने तो मेरी चिंता ही दूर कर दी माँ , तुम कितनी अच्छी हो। 
ध्रुव की चिंता कुछ हद तक कम हो गई, लेकिन बालमन तो बालमन है उसे शांत कैसे रख सकता था वह? उसने माँ से कहा, माँ क्या मामा मुझे लेने आऐंगे या हमें ही वहाँ जाना होगा ? .. 
ध्रुव का सवाल सुन वह हड़बड़ा गई, क्योंकि वह जानती थी कि अपना बेटा ध्रुव हर बार मामा की राह देखता रहता है कि वह कब आएगा और कब अपने गाँव की सैर करायेगा लेकिन कोई न कोई बहाना बनाकर वह अपने भांजे को लेने घर न आता, शायद उसी वक्त उसे काम आता होगा कि वह अपने बहन यानी मुझे और ध्रुव को समय भी न दे सके | क्या उसे अपनी खेती से समय भी नहीं मिल पाता कि दूसरों की खुशी के खातिर वक्त निकाल सके, क्या सच में मेरा भाई स्वार्थी हो गया है या अपने जीजाजी के क्रोध के चलते वह इस दरवाजे को लांघना नहीं चाहता? आखिर उनके क्रोध में भी प्यार है जो उसे दिखाई न देता? 
ध्रुव जब उसके पल्लू को हाथ लगाने लगा और वही सवाल दोहराया तो अपने मन में चल रहे द्वंद को शांत कर उसने "हा ध्रुव," इतना कहकर उसकी जिज्ञासा को शांत किया.. लेकिन अपनी बैचैनी कैसे शांत करती |
उसने स्वयं को अपने काम में लगाया लेकिन फिर भी उसका मन अपने भाई के दोहरे चरित्र के प्रति द्वेष पैदा कर रहा था , उसका सिर फटे जा रहा था किंतु मन के सवाल थमने का नाम नहीं ले रहे |
शाम के वक्त ध्रुव के पिता घर आये तो पत्नी का चेहरा देख वह भाॅंप गए कि कुछ तो हुआ है अन्यथा हमेशा खुशमिजाज रहता चेहरा उखड़ा हुआ न होता |
क्या हुआ है तुम्हें गौरी, आज तुम्हारा चेहरा ही बता रहा है कि दिनभर तुम कितनी परेशान थी। 
कुछ नहीं जी ऐसी कोई बात नहीं। 
तुम कुछ छुपा रही हो, बताओं और शांत हो जाओ, कहीं तुम्हारी परेशानी का हल मुझसे सुझ जाए। 
अपने पति के आग्रह पर उसने सारी बात बिना रूके एक ही सांस में कह दी और अपने आपको शांत किया |
बस इतनी सी बात और इतनी चिंता, क्यों नहीं बुला लेती हो उसे। 
क्या वह कभी खुद न खुद नहीं आ सकता अपनी बहन और भांजे की खुशी के लिए, क्या हम ही हरबार उसे बुलावा भेजे। 
तो क्या हुआ वह तुम्हारा भाई है और तुमसे छोटा भी, भूल जाता होगा बेचारा। 
वह भुलक्कड़ तो नहीं, वो हमारे घर अपने अहम के कारण नहीं आता, उससे आपके गुस्से में छिपा हुआ प्यार नहीं दिखाई देता। 
ऐसी कोई बात नहीं गौरी, तुम अनाप - शनाप न सोचो। 
क्यों ना सोचूँ, जो सच है वो कभी ना कभी सच सामने तो आता ही है। 
बहुत हो गई बातें इतना सारा द्वेष अपने भाई के प्रति, मैं कभी सोच नहीं सकता, अभी परीक्षा में इंतजार है, मुझे पूरा यकीन है वो जरूर आयेगा .. कहकर रमन सो गया |
गौरी ने भी अपने नेत्र बंद कर लिए | 
अगली सुबह गौरी का चेहरा देख रमन ने इशारों में शांत रहने को कहा और वह अपने काम को घर से निकल गया| गौरी ने अपने काम में मन लगा दिया और चिंता से दूर रहीं |
आज ध्रुव के परीक्षा का आखिरी दिन | जब अपने विद्यालय जाने लगा तो माँ को अपना वादा याद दिलाया |
गौरी को अब चैन नहीं आ रहा था और वह बार - बार दरवाजे पर आकर अपने भाई की प्रतीक्षा करते हुए चहलकदमी करने लगी जैसे- जैसे समय बीतता गया उसके दिल से धड़क - धड़क की आवाजें आने लगी |
कुछ घंटे बाद उसे ध्रुव आता दिखाई देने लगा और उसके साथ ऑंखों पर काला चश्मा पहने और सूट- बूट पहना कोई अजनबी आता दिखाई देने लगा तो उसका दिल ओर जोरों से धड़कने लगा | ध्रुव अपनी माँ को लिपट गया और खुशी से कहने लगा, माँ आज मुझे लेने मेरे मामाजी आए, आज मैं बहुत खुश हूँ |
उसकी बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था, वह उस व्यक्ति को एकटक देखती रही, जब उसने अपना चश्मा उतारा तो गौरी हक्की - बक्की रह गई | उसके भाई का रंग- रूप उसके लिए अविश्वसनीय था |
शाम होने को थी तो गौरी अपने भाई को निकालने लगी क्योंकि उसे डर था कहीं उन दोनों के बीच मतभेद होकर दूरी ना पैदा हो जाए | अपने दिदी की मंशा सुजित बखूबी समझ चुका था, फिर भी वह अपने जिजाजी से मिलने के बाद ही वहाँ से निकलना चाहता है |
दरवाजे पर दस्तक हुई | सुजित ने नमस्ते किया और दोनों में काफी बातचीत हुई | सुजित ने अपनी बिती जिंदगी की दास्ताँ बताते हुए कहा, " दिदी, मैं इतने सालों से यहाँ नहीं आ रहा था तो आप लोगों को लगा होगा कि मैं आपसे नाराज हूँ, जिस दिन आपने मुझे फटकार सुनाई उस दिन काफी गुस्सा हुआ पर कुछ दिनों पश्चात न जाने कैसी उमंग आई और मैं अपनी राह खोजने घर के बाहर चल पड़ा, उसी खोज के चलते मैं किसी को जितना चाहिए था उतना वक्त ना दे सका बल्कि स्वयं के लिए भी समय निकाल न पाता, अपनी खेती में नये - नये प्रयोग कर बंजर पड़ी धरती को ऊपजाऊ बना पाया आज मैं जिस मुकाम पर हूँ उसके असली हकदार आप हो, आप हो |" 
आज मैं ना सिर्फ अपने भांजे को लेने आया बल्कि आप सबके साथ ये दिवाली मनाने के लिए अपने गाँव लेने आया हूँ, मैं जानता हूँ आप मुझे नाराज नहीं करोगे |
सुजित की बातें सुन रमन को बहुत खुशी प्राप्त हुई और गौरी की चिंता हमेशा के लिए दूर हो गई और ध्रुव तो अपने मामा के साथ जाने की तैयारी में उछलने लगा |


द्वारा Manthan Deore
Shared18 Oct 2025
Start 31 Dec 1899
End 31 Dec 1904
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