भाग १६
वैदेही को लग रहा था आज उसके सिर से बहुत बड़ा बोझ उतर गया है.. जब भी वह वज्र से मिलती, वह उससे नज़रे मिलाने से डरती थी.. न जाने कब उसकी पलकों में ठहरे मोती छलक जाएं, उसे खुद पता नहीं था! आखिर शूल सी चुभती सच्चाई को अंतर्मन में दबाये रखना क्या आसान बात थी? हर पल उस टीस को सहना और आह भी नहीं भरना, रस्सी पर चलने जैसा कठिन कार्य था मगर सुबह आबा ने उसकी अनकही उलझन को पलक झपकते ही सुलझा दिया था! अब वह वज्र से आँखों में आँखें डाल कर, दिल खोल कर बात कर पायेगी यह विश्वास था उसे! कई दिनों से दर्द का उबलता लावा जो वह दिल में दबाएं बैठी थी एक धगधगते ज्वालामुखी सा, उसे आज सही वक़्त पर बाहर निकलने का रास्ता मिल गया था! दोस्त के कन्धे पर सिर रख कर वह खुल कर रोना चाहती थी, दर्द-पीड़ा को बाँटना चाहती थी मगर इस सुख से भी वंचित रहा गई थी वह!
यश के आते ही वह पर्स उठा कर चलने लगी.. माँ से उसने पहले ही कह दिया था आज तीनों वज्र के यहाँ भोजन करेंगे... आज पूरी मित्र-मंडली को आबा की तरफ से खास पार्टी थी...
यश और वैदेही बातें करते-करते कब वज्र के घर के करीब पहुँच गए पता ही नहीं चला!
अभी-अभी पूर्णमासी का चन्द्रमा अपनी नटखट छवि लिए नभ में अवतरित हुआ था... निशा ने सितारों की कशीदाकारी से सजी अपनी कजरारी चुनर क्या लहराई, चांदनी में भीगी नव-यौवना सी सृष्टी अपने कोमल मनोभावों को छुपाने का अट्टाहास करने लगी! मंद-मंद पवन के शीतल झोंके वैदेही की स्वच्छन्द लटों को बार-बार छेड रहें थे और वह बार-बार उन्हें
उंगलियों से संवारने की कोशिश कर रही थी...
यश की ज़िद्द-जीवट देख वह अचंभित थी! चेहरे पर न कोई सलवट न शिकन! वह ऐसे चल रहा था मानों राजा का झूमता हाथी! न दुनिया की पर्वा न कल की चिंता! मानों सब कुछ ऊपरवाले को सौप कर बन्दा जीवन का दिल खोल कर मजा ले रहा हो! जीवन की तरफ देखने का उसका नजरियां इतना सकारात्मक, रचनात्मक और सुलझा हुआ कैसे? वह स्वयं ही स्वयं से प्रश्न कर रही थी! उसकी जगह मैं होती तो... कभी-कभी सवाल का जबाब ही कई प्रश्न खड़े कर देता है मानों धरती पर पड़े परागकणों से सृजीत अनगिनत अंकुर!
दोनों वज्र के यहाँ समय पर पहुंच गएँ ... बंगले के मुख्य द्वार की दहलीज पर मिट्टी के दो दीये जल रहे थे अद्भुत स्थिरता और दृढ़ता के साथ! दीयों की मद्दीम रोशनी में घर अलौकिक आभा से दमक रहा था! वज्र ड्राइंग रूम में आबा के साथ कुछ विचार-विमर्श कर रहा था..वैदेही, यश की आहट पा कर वह उत्साहित हो गया! आबा ने भी उठ कर दोनों का हँस कर स्वागत किया और तीनों वज्र के कमरे में जा कर बैठ गएँ...
आबा ने बच्चों के लिए गोबी मंचूरियन तथा टॉमेटो सुप बनवाया था! अन्नपूर्णा सच में 'अन्नपूर्णा' थी! उसके हाथ की बनी चीजें खाते-खाते सभी अपनी उंगलियाँ चाटते-चाटते रह जाते!
वैदेही, यश और वज्र आज कई दिनों बाद खुल कर बतिया रहे थे! सुप का लुत्फ़ उठा रहें थे..मंचूरियन की ग्रेवी तो इतनी स्वादिष्ट बनी थी कि सभी चम्मच चाट-चाट कर गोबी मंचूरियन का मज़ा ले रहे थे...
आबा जानते थे, खाली पेट ज्ञान की बातें हजम नहीं होती! ज़िन्दगी के साठ बसंत देख चुके आबा यानि कि विनायक राव पाटिल वक़्त की नब्ज़ पकड़ना जानते थे... सालों खेती-बागबानी कर धरती माँ की गोद में पले-बढ़े आबा जानते थे कब हल चलाना है, कब बीज बोना है, कब फसल काटनी है और कब धान को घर-घर पहुँचाना हैं! धीरज, सबूरी उनकी खासियत थी और मेहनत उनकी सफलता की कुंजी! साफ़-सरल ह्रदय आबा को देख नीली छतरीवाला भी उन पर अपनी कृपादृष्टी बरसाता था....रिश्ते बनाना और उन्हें संजोना- संवारना वे बखूबी जानते थे!
वैदेही, यश और वज्र अब स्वाभाविकता की ऒर बढ़ रहें थे तभी वैदेही ने यश के पीछे रक्खी पर्स मांगी! यश बोल पड़ा, "कुछ खास गिफ्ट लाई हो क्या अपने खास दोस्तों के लिए? यार! 'खुल जा सिम सिम'... जल्दी करों....
वज्र भी मुस्कुरा कर बोल पड़ा, " क्या 'अल्लाउद्दीन का चिराग' लाई हो जादूगरनी ? "
दोस्ती का रिश्ता भी क्या अजीब रिश्ता होता है न...मुरझाएँ मन को तरों-ताज़ा कर देता है, तन्हाईयों में भटकते मन को दीपस्तम्भ सा सही दिशा दिखाता है, अच्छे-बुरे वक़्त का सच्चा हमसफ़र बन डूबते को तिनके का सहारा देता हैं, कभी अपनी वाणी से, कभी कृति से तो कभी अपनी 'जादुई झप्पी' से!
सभी कहकहें लगा रहे थे और आबा राहत की साँसे ले रहे थे... उन्हें लगा बचपन का मासूम, भोला-भाला वज्र अपनी उम्र भूल खिलखिला रहा है...
छोटू आकर खाली प्लेटस, बाउल्स तथा खाली ग्लास वहाँ से उठा कर रसोई में लेकर गया...आबा भी निश्चिन्त हो कर पूजाघर में चले गए और वैदेही ने विनय का अल्बम सबके सामने रख दिया... वहीं अल्बम जिसमें उनके सारे नुक्कड़ नाटक लिखें हुए थे, उनकी प्रस्तुतियों के सभी छायाचित्रों को करीने से सजा कर लगाया गया था...
यादों के श्वेत परिंदे अब थक कर विशाल वटवृक्ष की डालियों पर सुस्ता रहें थे...एक-एक छायाचित्र स्मृतियों की आकर्षक पुस्तक का मानों मुखपृष्ठ था! सफलता के कई शिखरों को फतह करने के साक्षी थे वो अनमोल पल!
विभा-विनय के अथक प्रयासों की श्रुँखला की असंख्य कड़ियाँ थी वो डायरी! सभी क्षणचित्रो में कैद थे वो मखमली लम्हें, सुनहरे पल!
तीनों मित्रों की आँखें नम थी और गला रूँधा हुआ!
आबा ने सुबह ही विनय के पापा से फ़ोन पर बात कर रात का समय लिया था.. विनय की माँ से सब काम निपटने के बाद बात करना उचित समझा था आबा ने क्योंकि बच्चों का उनसे बात करना मतलब बड़ी मुश्किल से सतह पर शांत, गंभीर दिखाई दे रहे सरोवर के पानी में पत्थर फेंकना ही था! आबा ने तीनों से स्वीकारोक्ति ले विनय के पापा को कॉल लगाया और उनसे कुछ औपचारिकता निभा कर फ़ोन वैदेही के हाथ में दिया... कुछ पल नि:शब्दता थी दोनों तरफ... फिर वैदेही बोल पड़ी, " प्रणाम ऑन्टी जी! कैसी तबियत है आपकी.. वहाँ से कुछ मुरझाये से स्वर सुनाई दिएँ और वैदेही ने वज्र के हाथ में फ़ोन दिया... वज्र ने उनको धन्यवाद दिया और कहा, "आन्टी जी! आपके बेटे और मेरे मित्र का दिल धड़क रहा है मेरे शरीर में! आपका बेटा जिन्दा हैं मेरे रूप में... मुझे आशीर्वाद देना ऑन्टी जी... आपका ऋणी हूँ मैं... और रूँधी आवाज़ को छुपाने की असफल कोशिश करते हुए उसने यश को फ़ोन थमा दिया! विनय की माँ राजरानी जी ने उसको ऑपरेशन के बारे में, 'जयपुर फुट' लगने के बाद के हालात के बारे में पूछा... यश मुस्कुरातें हुए बोल पड़ा.. आन्टी जी! आशीर्वाद दो बेटे को.. देखो! आपका यह बेटा अगले पैरालिंपिक में मेडल जीत कर लाएगा... मुस्कुरा कर आशीर्वाद देना जी! तभी फलेगा आपका जादुई आशीर्वाद" अब विनय की मम्मी भी हँसी रोक नहीं पाई ...यश ने जादू जो चला दिया था उनपर..
बाद में सभी ने बारी-बारी से विनय के पापा वीरबहादुर सिंह थापा जी से बात की, उन्हें दिलासा दिया और भारी मन से उन्हें अलविदा कहा!
वज्र अब कुछ शांत, धीर-गंभीर हो गया था... मन का उबाल कुछ थम गया था... रात का अँधेरा गहरा गया था.. सभी ने ख़ामोशी से भोजन किया और चल पड़े अपने आशियाने की ऒर.. कल कॉलेज भी जाना था... आबा ने गाड़ी के ड्राइवर को निर्देश दिए...यश और वैदेही वज्र से गले मिल, सबको शुभरात्रि कह कर चल पड़े अपने गंतव्य की ऒर..
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|
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