ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ५७
भाग ५७

विभा का बिल्कुल मन नहीं लग रहा था! यश प्रैक्टिस के समय अपना मोबाइल ऑफ कर कर रख देता था। उससे बात करनी तो रात के समय ही कॉल करना पड़ता था! विभा तो मानों हँसी-मज़ाक करना ही भूल गई थी। मन को बहुत समझाने के बाद भी वह सामान्य स्थिति की ऒर नहीं लौट पा रही थी!  खुद वह समझ नहीं पा रही थी कि कैसे वह यश के साथ इस कदर जुड़ गई कि उसके बिना जीना उसके लिए इतना मुश्किल हो गया! आखिर कैसे जुड़ गए उसके दिल के तार यश के दिल से? जीतना वह सोचने लगती उतनी वह गहरी खींची जा रही थी नदी में छुपे भंवर में! 

अगले ही पल उसे यश की बात याद आ जाती हैं। लक्ष्य को पाना हैं तो लक्ष्य पर नजर गढ़ाये रखनी होगी! प्यार, दुनियादारी, रिश्ते-नातों में उलझ गए तो भूल जाईये मंजिलों को, तमगों की चमक को, आरोहण करते तिरंगे को, आसमान में गुंजते राष्ट्रगान को! यूँही नहीं बनती पाषाण से प्रभु की प्रतिमा! बहुत घाँव सहने पड़ते हैं, पीड़ को जज़्ब करना पड़ता हैं, काँटोंभरी राह पर बहुत दूर तक चलना पड़ता है टीस भूल कर! 

विभा के दिल के ग्रामोफोन की अटकी सुई अब किरकिराने लगी थी! तभी यश का फ़ोन आया! वह फ़ोन पर बातें करने लगी मानों कई दिनों की जद्दोजहद के बाद आज पूनम का चन्द्रमा फलक पर मुस्कुरा रहा हो! वीडियो ऑन कर उस ने फिर एक बार फिर अपनी बात दोहराई, " वैदेही! भले ही हम एक पोडियम पर न सही, एक ही साल हम दोनों देश के लिए मेडल जीत सकते हैं! विभा! मैं हर पल तुम्हारे साथ, तुम्हारे जेहन में, तुम्हारी हर सुख-दुःख की घड़ी में साथ हूं! अहसासों को देखा नहीं महसूस किया जाता हैं! प्रैक्टिस में लापरवाही नहीं चाहिए मेरी ब्यूटी क्वीन! प्रॉमिस? " 
वैदेही कुछ बोल ही नहीं पा रही थी! शब्द खामोश थे, आँखों की झील में लबालब भरी पीड़ा अश्क़ के रूप में बरस रही थी। रोते-रोते विभा बोल पड़ी, "यस माय बेस्ट फ्रेंड! आई प्रॉमिस यू! आई विल डू इट " वज्र बोल पड़ा, " "झाँसी की रानी... रोते हुए....हे भगवान! कल्पना ही कितनी अकल्पनीय हैं! वीरता की मूरत.. रोते हुए! और वह जोर-जोर से हँसने लगा! विभा के आंसू हवा के साथ फुर्र होते बादलों से दूर भाग चुके थे! सुनहरी धूप मे सारा व्योम जगमगा रहा था और उम्मीदों का सतरंगी इंद्रधनुष फलक पर उभर चूका था!

विभा को अपनी गलती समझ में आ रही थी लेकिन वह खुद को नए परिवेश में ढाल नहीं पा रही थी। वज्र और  वैदेही को वहीं काम सौंपा था यश ने! वह जानता था बाहर से ताड़गोले सी कठोर दिखाई देती वैदेही असल में बहुत भावुक और संवेदनशील हैं! 

विभा छोटी बच्ची सी पल में रूठ रही थी तो अगले ही पल मुस्कुरा रही थी। यश की बातें उसके कान में मन्दिर की घंटियों सी गूंज रही थी। 'बोल्ड & ब्यूटीफुल' विभा इतनी कमजोर कैसे हो गई? क्या यश के बिना उसका अस्तित्व ही नहीं हैं? नारी शक्ति की बड़ी-बड़ी बातें करनेवाली विभा इतनी शक्तिविहीन कैसे हो गई? ऐसा मनोबल लेकर उतरेगी वह बैडमिंटन कोर्ट पर? 

तभी वज्र का फ़ोन आया। वह वैदेही के साथ उसके घर पर आ रहा था। विभा ने राहत की सांस ली! कुछ तो माहौल बदलेगा जब मिल बैठेंगे हम दो-चार यार-दोस्त साथ-साथ! उसने जल्दी-जल्दी चेहरे पर ठण्डा पानी छिड़का, चेहरे पर पाउडर लगाया और बालों को कंघी कर वह फ्रेश हो चुकी थी तभी डोअर बेल बजी! विभा ने दरवाजा खोला तो सामने वज्र और वैदेही गुलाब के फूलों का गुलदस्ता लिए खड़े थे! गुलाबी गुलाब के फूल विभा की कमजोरी थे! फूलों को देख विभा बहुत आनंदित हुई! 

वज्र और वैदेही ने विभा के साथ ही बैडमिंटन कोर्ट पर खेल देखने जाने का मन बना लिया था! विभा ने वीणा को फ़ोन लगाया और उसे प्रैक्टिस के लिए बुलाया! दोनों की जोड़ी बन चुकी थी और दोनों के बीच तालमेल भी बढियाँ था! सिर्फ उनके हुनर को थोड़ा तराशने की जरुरत थी। दो दिन बाद नितीन सर लौटने वाले थे! सभी को अपना दमखम बढ़ाना था क्योंकि बहुत बार मैच के अंतिम दौर में खिलाडी इतना थक जाता है कि उसका खेल धीमा पड़ जाता  हैं और हाथ में आई हुई बाजी हाथ से फिसल जाती है! अगर राष्ट्रीय स्तर पर खेल में चुनौती देनी हैं तो हर स्तर पर बेहतर तैयारी जरुरी हैं।

वज्र और वैदेही ने विभा से ढेर सारी बातें की! असल में वह लाली और यश दोनों के न होने कारण बिल्कुल अकेली पड़ गयी थी! वैदेही और वज्र कॉलेज में मिलते जरूर थे लेकिन बातें बहुत कम होती थी! बातें भी व्यापार, क्रय-विक्रय की ज्यादा, साहित्य कला की कम।
विभा असल में बहुत ही प्रतिभाशाली थी। कविताओं में वह अपना दिल निकाल कर रख देती थी! वज्र ने उसी के बारे में विचार-विमर्श करना ठीक समझा। उसके ह्रदय का स्पंदन उसकी कविता में झंकृत होता था! उसके लिखें नुक्कड़ नाटक समाज की विषमताओं पर प्रहार करते थे! शायद संवेदनाशील मन ही दूसरों की पीड़ा को समझ पाता है!

शुरूआती वर्जिश के बाद विभा और वीणा गेम खेलने लगी! विभा अनुभवीं खिलाडी हैं यह उसके हर पैतरे से समझ में आ रहा था! उसकी प्लानिंग जबरदस्त थी। वह शटल को इस तरह इस छोर से उस छोर मारती थी कि सामने वाला खिलाडी यहाँ-वहाँ दौड़-दौड़ कर ही थक जाता था! विभा नेट पर भी बहुत अच्छा खेलती थी! उसका अनुमान बहुत ही सटीक था। उसे एकल तथा युगल स्पर्धा में खेलने के लिए चुना गया था!

वज्र को खेलों में बहुत रूचि थी! खेल खेलना और खेल  देखना उसे बहुत पसंद था लेकिन उतना समय नहीं मिल पाता था कि वह आराम से, तनावरहित हो कर कोई मैच देख पाता! वैदेही को विभा का खेल बहुत पसंद था। वह जहाँ तक हो सकें, विभा का मैच देखना नहीं चुकती थी! 
उसका खेल ही इतना आकर्षक, तेज-तर्रार था कि मन को मोह लेता था! किसी का भी बिच में उठने का मन ही नहीं होता था। पूरा एक घंटा हो चूका था। सभी थक चुके थे और बैडमिंटन कोर्ट को बन्द करने का समय हो चूका था! 
विभा ने सब से विदा ली और चल पड़ी वज्र और वैदेही के साथ! अगले ही हफ्ते उनकी टूर्नामेंटस शुरू होनेवाली थी जिसमें उम्मीदें ज्यादा थी। नए सपने बुने जा रहे थे और और सपनों में रंग भरने के लिए 
नितीन सर के मार्गदर्शन का इंतज़ार था...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगले हफ्ते अगला भाग....


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