भाग २२
विभा के दर्दनाक हादसे के बाद पद्मावती जी का जीवन की तरफ देखने का नजरिया ही बदल गया था! कल तक सिर्फ अपने घर-परिवार में उलझी विभा की मम्मी अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए सिद्ध हो चुकी थी! सालों अपने पति, बाल-बच्चे में उलझी पद्मावतीजी अब स्वयं को तलाश रही थी! पुणे के SNDT महिला विश्व विद्यालय से गृह विज्ञान में स्नातक की पदवी प्राप्त की थी उन्होंने यह तो मानों वह भूल ही चुकी थी!
विभा के समझाने पर ही तो वो अपनी सहेली माला के साथ जयपुर जाने को तैयार हुई थी! 'जयपुर दर्शन' का भी दोनों सहेलियों ने मज़ा लिया और लौटते वक़्त मुम्बई उनका खास गतंव्य स्थल था!
नामी-गिरामी हस्ती की बेटी की शादी और मुम्बई में शॉपिंग न हो यह कैसे हो सकता था? पैसे की तो कमी थी नहीं! दोनों महिलाएं स्थापित राजनीतिक खानदान से जुड़ी थी! अपने-अपने क्षेत्र में उनके परिवार का जबरदस्त प्रभाव था! ऐसे में शादी धूमधाम से होना तय था! माला प्रतिभा जी और जानकी जी को बेटी की शादी की निमंत्रण पत्रिका हाथोंहाथ देना चाहती थी क्योंकि कुछ दिनों के साथ ने एक अटूट रिश्ते को जन्म दिया था! मांगलिक कार्य के शुभारम्भ के लिए दोनों अपने साथ फल, मेवे लेकर गई और उन्हें भेट स्वरुप दिएँ!
आबा उन्हें मिल नहीं पाए क्योंकि वो बाबा के साथ हॉस्पिटल में ही रुके थे! चाय-नाश्ता कर वो दोनों घर की ऒर निकल पड़ी! ड्राइवर उन्हें घर पर छोड़ गया...सुबह पांच बजे पहुँचने का वादा कर वह गाड़ी में पेट्रोल डलवाने, टायर की हवा, ब्रेक चेक करने के लिए गाड़ी लेकर चला गया... पुराना विश्वासपात्र ड्राइवर था वह दादा का.. उन्हीं के सहयोग से पढ़ा-लिखा, स्व-रोजगार प्राप्त कर आज स्वावलम्बी जीवनयापन कर रहा था!
भोर में ही निकलना था उन्हें कराड के लिए ताकि ट्रैफ़िक जाम में न फँसे!
विभा का मुस्कुराता, खिला-खिला चेहरा देख दोनों बहुत आनंदित थी! व्यक्ति दो और इतना सामान! विभा देख कर बोल पड़ी.. "सारा जयपुर-मुम्बई का बाज़ार उठा कर लाया हैं क्या?" और तीनों हँस पड़ी!
"विभा! दिव्या की शादी की तारीख याद रखना! दस दिन पहले आना हैं तुम्हें.. पहले ही कह देती हूं बेटा! कोई बहाना नहीं चलेगा हं... "विभा ने भी गले मिल कर उन्हें विश्वास दिलाया और अपने कमरे में चली गई!
सुबह दोनों कराड के लिए निकल गई और विभा कॉलेज के लिए....
आज महाविद्यालय में रक्तदान शिबिर लगने वाला था! पूरी मित्र-मण्डली ने उसमें स्वयंसेवक की जिम्मेदारी निभाने का प्रण लिया था! रक्तदान के लिए छात्र-छात्राओं का उत्साह देख कॉलेज की कार्यकारिणी बहुत उत्साहित थी! विभा ने शिबिर के लिए बैनर बनायें थे! वो इतने आकर्षक थे कि अनायास ही सबका ध्यान खींच लेते थे!
'रक्तदान महादान', 'एक बूंद खून की, संजीवनी जीवन की' जैसे सन्देश पढ़ कर हर कोई रक्तदान के महायज्ञ में शामिल होने के लिए लालायित था! यश प्रवेशद्वार पर सबके रजिस्टर में नाम, मोबाइल / फ़ोन नंबर लिख कर जरुरी औपचारिकता पूरी कर उन्हें आगे भेज रहा था तो वज्र उनकी पिछली स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी ले रहा था! वैदेही और विभा रक्तदान के समय सभी का ध्यान रख रही थी! रक्तदान का सौभाग्य भी कहाँ सबको प्राप्त होता हैं? शरीर में हिमोग्लोबिन की कमी हो या पीलिया जैसे रोग, रक्तदान की इच्छापूर्ति में अडिंगा बन जाते हैं!
इस मित्र-मण्डली से कॉलेज के सभी लोग बहुत प्रभावित थे! तमाम कठिनायियों के बावजूद भी उनका हौसला, रचनात्मक कार्यों में उनका योगदान उल्लेखनीय था! जब भी यह पूरी टीम ऐसे कार्यों में जुट जाती, उनकी आँखें चमक उठती.. उन्हें लगता, हमने इंसानियत के महाकुम्भ में गिलहरी का योगदान दिया हैं! उन्हें असीम जीवन- आनन्द की अनुभूति होती! यहीं उनकी ऊर्जा थी जिसने उन्हें ज़िन्दगी में पटखनी खा कर भी जीत को अपनी ऒर खींच लाने का माद्दा दिया था!
आज घर जाने को ही दो बज चुके थे! जरासी देर हुई नहीं कि आबा के फोन का सिलसिला शुरू हो जाता था! न जाने क्यों उनके मस्तिष्क में एक अनजान डर ने घर कर लिया था हालांकि वज्र ने पहले ही उन्हें रक्तदान शिबिर के बारे में सूचित कर दिया था!
आबा चुनौतियों का सामना करते-करते अब थक चुके थे! आखिर जीवन-शिशिर की सर्द हवा को वह कब तक सहन करते? लेकिन बाबा को देख उनका हौसला बुलंद होता! अस्सी के ऊपर पतझड़ देख चुके बाबा अगर हार नहीं मानते तो फिर मैं तो अभी अभी षष्ठी पार कर चूका हूं... अभी से हथियार कैसे डाल दूँ? मन में जैसे ही सकारात्मक भाव जागृत होते, मन पर कब्ज़ा कर चूका कोहरा नौ दो ग्यारह हो जाता! आबा फिर नए जोश के साथ काम में लग जाते!
आज बाबा की सभी रिपोर्टस आनेवाली थी! सुबह-सुबह डॉक्टर से बात हो चुकी थी! डॉक्टर ने रिपोर्ट्स का इंतज़ार करने को कहा था! मुम्बई आकर बाबा बहुत खुश थे.. वज्र, वैदेही और जानकी कल उनसे मिल कर गये थे न! कहानियों के राजा की जान जैसे तोते में होती हैं न, वैसे ही बाबा की जान वज्र में थी! वज्र को हँसता-खेलता देख बाबा को मानों संजीवनी मिल गई थी! बाबा उतावले हो रहें थे, घर जाने के लिए! आबा ने प्रमिला जी और आई को बुलाया था कुछ समय यहाँ रुकने के लिए! थोड़ी देर घर जा कर, भोजन कर वो विश्राम करना चाहते थे! रोज की भागदौड़ से ज्यादा वो चिंता, तनाव सेवठाक गए थे। एक समस्या का समाधान नहीं होता उसके पहले ही दूसरी समस्या दरवाज़े पर दस्तक देती उन्हें नज़र आती! वक़्त ने ऐसी करवट ले ली थी कि उन्हें पुरे परिवार के कुशल मंगल के लिए खुद हिट एंड फिट रखना जरुरी हो गया था! शाम को डॉक्टर को मिलने उन्हें हॉस्पिटल पहुंचना ही था! कल वज्र के रूटीन फॉलो अप के लिए उन्होंने अपॉइंटमेंट ले ली थी!
तभी विभा का फ़ोन आया! माँ और उनकी सहेली दोनों सकुशल अपने घर पहुँच चुकी थी! आबा ने राहत की सांस ली! अकेली दोनों महिलाएं जा रही थी तो चिंता तो होगी ही न! खास कर एक दुनियादारी के अनुभव से परिपक्व हुए व्यक्ति को! आबा का स्वभाव ही ऐसा था...सब की चिंता थी उन्हें! सब का बोझ कन्धे पर उठा कर चलने में थोड़ी दिक्कत तो होगी ही न..पर आबा का जीवन-दोना इन्हीं खुशियों से भरा हुआ था! हजारों की दुआएं ही उनके परिवार का अभेध्य कवच-कुण्डल था..इन्हीं के सहारे उनकी जीवन-नैया तूफानों का सामना बेखौफ़ हो कर करती थी...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई
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