धड़कनों का संगीत?
धड़कनों का संगीत?
 
वर्षा ऋतु ने प्रकृति की हरियाली कालीन पर मोतियों की लड़िया बिखेर दी और बूँदों की टप-टप का संगीत सुनते-सुनते मेरे दिल की धड़कनें तेज हो गई! खुशनुमा बयार ने अपनी पायल की झंकार से मुस्कुराते फूलों को दीवाना बना दिया और परिंदों के पंखों की फड़फड़ाहट से यादों की रेशमी लड़ियों की रेषा-रेषा अलग हो कर कहकहें लगाने लगी! मैं कुछ पलों के लिए अन्तरमुख हो गई! पता हीं नहीं चला कब प्रियतम की आहट पाकर पलकों में छुपे ख़्वाब मुस्कुराने लगे, पारिजात की कलियाँ सुनहरी किरणों के स्पर्श को महसूस कर मुस्कुराने लगी और मैं अतीत की सुनसान गलियों में किसी की तलाश में भटकने लगी!
पूना की पॉश कॉलोनी में दादाजी ने बंगला ख़रीदा था जिसका नाम 'समर्पण' रक्खा था! आँगन में गुलाब, मोगरा, पारिजात बरसों से मुस्कुरा रहें थे और वो हमारी मौज- मस्ती, हुड़दंग के साक्षी भी थे! बच्चें दादाजी से डरते भी थे और उनका सम्मान भी बहुत करते थे! आर्मी का रिटायर्ड कर्नल वो भी बड़ी-बड़ी मुंछो वाला, रौबदार आवाज़ का धनी! मजाल है कि कोई उनकी आज्ञा कि अवहेलना करें! मैं उनकी बहुत लाडली थी! बचपन की दहलीज पार कर कब मैं जवानी के महल-मेरियों में मयूर-नृत्य करने लगी, पता हीं नहीं चला! यौवन की लालिमा गालों पर चमक रही थी और मैं मयूर पँखी सतरंगी सपनों में खोयी हुई थी! पीढ़ी दर पीढ़ी भारतीय सेना को सुशोभित करते तमगों से घर का अतिथि कक्ष सज़ा हुआ था! पिताजी से साल दो साल में एक दो बार मिलना आम बात थी!
मैं पेड़ों को पानी दे रही थी तभी बंगले के सामने एक जिप्सी रुकी और भारतीय नौसेना का एक युवा ऑफिसर गाड़ी से बाहर आकर फाटक को खोलने का प्रयास करने लगा! मैं सचेत हो गई और उस अजनबी, रौबदार ऑफिसर को पारिजात की ओट से निहारने लगी! पल भर में हीं नजरों से नजरें मिली और दोनों एक साथ बोल पड़े, " तुम! यहाँ? कैसे?" बचपन का पहला प्यार... सामने हो तो ह्रदय का स्पंदन तो बढेगा हीं न?
मेरे चेहरे का कमल खिल चूका था! उसकी गुलाबी आभा फ़िजा को रुमानी बना रही थी और मन को मखमली स्पर्श का एहसास करा रही थी! मानों मनजीत ने मेरे मन की वीणा की तार को छेड दिया था!
मैंने दादाजी को आवाज़ दी! वो आँगन में पीछे की तरफ पौधों के रखरखाव का जायजा ले रहें थे! मेरी पुकार सुन वह आगे की तरफ चले आएं! मनजीत को देख वह बहुत ख़ुश हुएँ और मैं शरमा कर, एक हाथ से उलझी लटों को सँवार रही थी और दूसरे हाथ से कंधे से ढलती चुनर को संभाल रही थी!
दादाजी को कुछ सामान देकर, नास्ता-पानी कर मनजीत चला गया मगर मेरे अंतस के सरवर में आशाओं के कई सरोज खिलने को बेताब थे! दिल की धड़कनों को काबू में रखना मुश्किल हो गया था पर क्या करें? किसे सुनाएँ यह पीड़, धड़कनों का संगीत?
 
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा |
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