नि:शब्द पीड़.. शाल-श्रीफल, तमगों-तोहफों का, खुमार अभी बाकी है!
मय जो चढ़ी शोहरतों की, उतरनी अभी बाकी है!
ढलते सूरज संग 'नारी-सम्मान' अंधियारे में गुम है!
'ढाक के तीन पात' सा शोषण, उत्पीड़न, गुमसुम है!
दरबारियों की कुत्सित हँसी बिच चीरहरण जारी है!
हर युग में पांचाली की नि:शब्द पीड़ भारी है!
अपनों के बीच, अपनों को अग्निपरीक्षा दे जानकी!
किसे फुरसत हैं पतिव्रता के आत्म -सम्मान, देह-भान की?
"बेटी बचाओ, बेटी पढाओ", किस-किस से बचाएँ बेटी को?
बागबान ही है बेरहम, किस के भरोसे पाले उम्मीद को?
अंतरिक्ष में खोई 'कल्पना', कैसे सजाएँ अल्पना?
लाखों 'सिन्धु' दर-बदर, कैसे पढ़ेगी कोमल मना?
कहाँ हैं माँ जिजाऊ के संस्कार, सिपाही- सालार शिवबा के?
पहुँचाए घर जो दुश्मन सुभेदार की बहु को ससम्मान से!
धरतीपुत्री जनकसुता बच न पाई दशानन से!
कैसे बचेगी कोमलांगी दरिंदगी के विद्रुप आनन से?
खुद ही को कर बुलंद, स्व-सुरक्षा में हो निपुण!
दुर्गा, तू वीणावादिनी, ज्ञान-शक्ति-श्रुँगार गुण!
नारी! तू नारायणी, आदिशक्ति तू, दुष्ट- संहारिणी!
जगत जननी, ब्रह्माण्ड व्यापी, तू विश्व तारिणी!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा,मुंबई, महाराष्ट्र!






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