ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ३४
भाग ३४

पिछले सप्ताह से आबा कुछ ज्यादा ही व्यस्त थे। उनकी निर्यात की हुई फलों की खेप कुछ कानूनी उलझनों की वजह से बंदरगाह पर ही अटकी पड़ी थी। उसी के निपटारे के लिए आबा दौड़-धूप कर रहें थे! आज आखिर उनका कनसाइनमेंट दुबई पहुँच गया था और शेख से बिल के भुगतान से सम्बंधित बात भी हो चुकी थी! 
आबा की कुण्डली में मुश्किलें सदा ही हाथ जोड़े खड़ी दिखाई देती थी और आबा उनका स्वागत करते थे मधुर मुस्कान से! गाँव की मिट्टी में पला-बढ़ा व्यक्तित्व था आबा का! आबा को शायद अटपटा, अजीबोगरीब तब लगता जब किसी काम में कोई अवरोध नहीं आता मानों खुदाई हो रहीं हो घर के नींव की और बड़ा पत्थर न आएं ! ऊपरवाला भी जानता था, यह सह्याद्री की वादियों में खेल-कूद कर पला-बढ़ा बच्चा है, पत्थरों से सिर टकराने का आदी है वो... आसानी से हार नहीं मानेगा! 

वज्र के रूप में ही उनकी उम्मीदें अंकुरित हो रही थी! पौध के फलने-फूलने में वक़्त लगेगा यह जानते थे वो! कमाल का धैर्य था उनमें और गणपति बाप्पा में अद्भुत विश्वास! वो जानते थे नीली छतरी वाला उन्हें निराश नहीं करेगा!

जैसे-जैसे जनवरी का महीना नजदीक आ रहा था आबा की धड़कने तेज हो रही थी! विनय के माता-पिता को वह 'मुम्बई दर्शन' करवाना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने बहुमान कार्यक्रम के तीन दिन बाद की टिकिटस बुक कराई थी। दोनों के खाने-पीने और रहने की व्यवस्था उन्होंने थ्री स्टार हॉटेल में कराई थी! संस्था उनके आने-जाने का खर्च वहन कर रही थी और रहने-घूमने का खर्च आबा ने अपने ऊपर ले लिया था! विनय के माता-पिता के ना कहने के बावजूद भी उन्होंने उनकी सारी व्यवस्था खुद संभाल ली थी।

बहुत दिनों बाद आज आबा थोड़े आराम से चाय पी रहें थे और साथ में अख़बार के पन्ने पलट रहे थे। बीच-बीच में आते सन्देश की ध्वनि उनकी भाव-समाधि में खलल डाल रही थी। पंछियों की आवाज़ उन्हें मन-मोहिनी लग रही थी! आँगन में बिखेरे अनाज के दानों को चुगते कबूतरों को देख उनका मन आनंदित हो रहा था! बीच-बीच में फुदक रही गौरय्या उनका अनायास ही ध्यान आकर्षित कर रही थी! आँगन के नीम की सरसराहट उन्हें उल्हासित कर रही थी तभी उन्होंने वज्र को अपनी ऒर आते देखा...

आबा ने छोटू से एक कुर्सी और मंगवाई और वज्र को इशारे से पास बुला लिया! बहुत दिनों बाद वज्र अपने पिता के सामने बैठा था! आबा उसे देख बहुत खुश थे! विनय का सिर्फ ह्रदय ही उसके शरीर में नहीं धड़क रहा था बल्कि उसकी बहुमूल्य दुआएं भी वज्र का कवच-कुण्डल बन गई थी! यह भी क्या बेमिसाल तरीका था विनय का दोस्ती निभाने का... आबा मन ही मन सोच कर उसे धन्यवाद दे रहें थे! 
बातों-बातों में आबा ने नाटक के मंचन के बारे में पूछा और सभी मित्र मण्डली का हालचाल पूछा! वैदेही के बारे जब आबा ने पूछा तो वज्र को भी बात को पकड़ने के लिए एक धागा मिल गया था। उसने आबा को जानकी जी की तबियत के बारे में बताया और अंत में वैदेही के मन में उथल-पुथल मचा रहें विचारों के बारे में खुल कर बात की।

आबा वज्र की बात सुन कर मन ही मन खुश थे लेकिन उन्होंने इस बात को वज्र को महसूस होने नहीं दिया। उन्होंने वैदेही से बात करने का आश्वासन दिया और फिर अख़बार पढ़ने में लग गए! आज उनका कहीं बाहर जाने का मन नहीं था! इतने दिनों की अनवरत भागदौड़ से वह बहुत थक चुके थे! 

जानकी जी आज खुद को बेहतर महसूस कर रही थी! वैदेही भी उत्साहित थी मगर उसने माँ का पूरा 'बॉडी चेक अप' कराने की बात मन में ठान लीं थी! बहुत मान-मनुहार कर, भावनात्मक दबाव लाकर उसने अंत में माँ को होम्योपैथिक डॉक्टर वीणा जी के यहाँ आने को मना लिया था। वैदेही ने आज ही डॉक्टर की 'परामर्श भेट' निश्चित की थी क्योंकि कल उसे प्रैक्टिस के लिए विभा के यहाँ जाना था!
वैदेही माँ की ना-नुकर के बावजूद उन्हें हर काम में मदद कर रही थी। दो दिन की माँ की अस्वस्थता ने उसे अंतरमुख कर दिया था! माँ को कुछ कम-ज्यादा हो गया तो... बस! इस बिजली से कौन्धते विचार ने ही उसे पंगु कर दिया था! पिता को तो वह खो ही चुकी थी! ले-दे कर उसकी कीमती दौलत थी उसकी माँ! वह किसी भी कीमत पर उस पर आँच आने देना नहीं चाहती थी। 

माँ-बेटी शाम को डॉक्टर साहिबा के क्लिनिक में गई! जानकी जी की शारीरिक कमजोरी और उम्र के ढलान की तरफ बढ़ते कदमों को देखते हुएँ उन्होंने सभी टेस्ट के लिए पर्ची लिख कर दे दी। कुछ होम्योपैथिक दवाईयाँ भी बना कर दी और रिपोर्ट्स ला कर अगले हप्ते बताने को कहा!

वैदेही और जानकी जी ऑटो रिक्शा का इंतज़ार कर रही थी तभी एक गाड़ी आ कर उनके पास रुकी...वैदेही कुछ पीछे हटने लगी तो वज्र ने आवाज़ दी... "वैदेही! दोघी गाडीत बसा! एक फोन करायचा न मला..."
वैदेही के पास 'नहीं' कहने के लिए कोई बहाना नहीं था! दोनों गाड़ी में बैठ गई और SUV हवा से स्पर्धा करने लगी।
जितना वैदेही वज्र से दूर जाने की कोशिश करती, उतनी ही वह उसके ज्यादा करीब आती जा रही थी! दोनों परिवारों में नजदीकियां बहुत थी पर व्यावहारिक फासलें भी बहुत थे। आबा के एहसानों की फेहरिश्त बहुत लम्बी थी जिसे भूलना मुमकिन नहीं था और यह फेहरिश्त दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही थी।

वैदेही उनका तहेदिल से सम्मान करती थी लेकिन वह अपना स्वाभिमान कहीं भी गिरवी रखना नहीं चाहती थी! उसके पिता हमेशा कहते, " अगर निर्णय करने की, जीने की स्वतंत्रता चाहिए तो किसी के भी एहसान उतने ही लो जीतना एहसानों का बोझ लेकर हम सीना तान कर चल सकें और दूसरी उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात है ... विपदा में काम आनेवालों को कभी भी जीवन के बसंत में विस्मृत मत होने देना! "

वैदेही विचारों के भंवर में उलझती जा रही थी तभी वज्र ने उसे पुकारा, "वैदेही! आंटी! गुड नाईट..उद्या भेटू आपण! " दोनों को घर के बाहर छोड़ कर उसने ड्राइवर को आगे बढ़ने का इशारा किया! 

आबा हॉल में बैठे-बैठे वज्र का इंतज़ार कर रहे थे। वो चाहते थे धीरे-धीरे वज्र को घर और व्यवसाय की जिम्मेदारी सौंप दे। मन में एक ही आशंका थी.. कहीं उसपर ज्यादा बोझ तो नहीं पड़ेगा? 
इसी द्वन्द में झूलते-झूलते वह अपनी ज़िन्दगी बिताने की कोशिश कर रहें थे! किस्मतवाले थे कि उन्हें अपनी पत्नी प्रमिला जी का पूरा साथ मिल रहा था, माता-पिता का माथे पर हाथ था लेकिन इन सब की सीमारेखा को वह बखूबी जानते थे और इसीलिए उन्हें वज्र का सुझाव अच्छा लगा! वैदेही से बेहतर मददगार कौन हो सकता था भला? दोनों की अपनी-अपनी मजबूरियाँ थी और दोनों  की अपनी-अपनी खासियतें! दोनों परिवारों के बीच में आपसी विश्वास की एक लम्बी श्रुँखला थी जिसकी कड़ियाँ बिखरने की, टूटने की रत्तीभर भी आशंका नहीं थी आबा के मन में! 
आबा खुद वैदेही से आमने-सामने बैठ कर बात करना चाहते थे। वह अपने सवालों का जवाब वैदेही से बिना किसी लाग-लपेट के लेना चाहते थे! जैसे बच्चों के ब्लॉग के खेल में सभी चित्र के तुकडे सही जगह पर जब जुड़ते हैं तभी वह चित्र पूर्णता प्राप्त करता हैं। यह व्यापार की बात थी.. यहाँ निर्णय सिर्फ दिल से ही नहीं, दिमाग़ से लेने पड़ते हैं, यह आबा जानते थे! 

आबा ने अपने बाल यूँही सफेद नहीं किए थे। वो जानते थे व्यापार करना कोई बच्चों का खेल नहीं हैं! 
व्यापार में कामयाबी तभी प्राप्त हो सकती हैं जब व्यापार के सभी घटक, पैसा, कल-पुर्जे, संसाधन, तकनीक, श्रम, प्रबंधन तथा व्यवस्थापन सही वक़्त पर, सही जगह जोड़ दिएं जाते हैं। 
आबा ने शून्य से शुरुआत कर शिखर तक व्यापार को पहुँचाया था! एक किसान के बेटे ने अपनी खेती-बाड़ी को अपनी मेहनत, सोच और संसाधन के बल पर विश्व पटल पर स्थापित किया यह अजूबा नहीं तो और क्या था? अब इस थाती को मजबूत बाजुओं के भरोसे सौपना था तो आबा को इम्तिहान तो लेना ही पड़ेगा न....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |
अगला भाग अगले अंक में..


इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर कहानी! आगे जे वहाग का इंतज़ार रहेगा!🙏❤️🙏❤️🙏❤️🙏