रिश्ते जो लब्जो में बयां होते है....
दिल के आसपास कहीं होते है,
जरासी धुप से पिघलते है,
नीर से ढलानसे फिसलते है....
रिश्ते जो नजरोंसे बयां होते है....
आंखोमे ओस से चमकते है.....
उड़ान से गगन चूम लेते है ...
तक़दीर के तेवर देख हंसते है...
रिश्ते जो धड़कने बयां करती है...
दिल से दिलके तार जोड़ देती है...
लालिमा गालोपर मुस्कुराती है...
फूल बगियाँ में खिला देती है....
रिश्ते जो फौलादी हाथो में पलते है...
उफनती लहरों को किनारों पे थाम देते है
वक्त को मुठ्ठी में भींच..
नए दौर में, नए हस्ताक्षर करते है!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |