#कविता
#12/11/25
शिक्षित होना बहुत जरूरी,
रहे शिक्षित, प्रशिक्षित, पढ़ा-लिखा
निज देश, समाज, परिवार।
क्षत- विक्षत, विक्षिप्त न रहें मानसिकता,
बशर्ते रहना शिक्षा के संग
सुसंस्कार ।
दयालुता, कर्मठता, निष्ठा, आदर, पारिवारिक
मूल्य का एकरार ।
नहीं रहे विभत्सता, अश्लिलता जो
बढ़ रही है पारावार।
तभी शिक्षा की सार्थकता है, होना गरिमामय
मृदु व्यवहार ।
नहीं रहे बिल्कुल अहंकार,पढ़ाई प्रवीणता
का तभी शिक्षा का सार।
देश भक्ति हो, हो चिंतन भी थोड़ा,
और रहना
संवेदना के तार ।
खुदगर्जी अगर घुसी,जहन में तो वो पढ़ना भी बेकार।
बने महत्वाकांक्षी,आकांक्षी भी पर मर्यादित हो आहार ।
रहन सहन खान पान में सादगी,
हो, आनंद प्रमोद
स्वीकृत हास परिहास
जो रहे सदाबहार ।
हिम्मत रखें, आपात आपत्ति काल में, रोग शोक का
हुआ यदि संचार ।
हर दिन के बात रात आती,
रात के बाद आता है दिन, धैर्य को बना आधार ।
अहिंसा अनुशासन अचौर्य,आध्यात्म का हिस्सा बना,
कर इसे स्वीकार।
वो शिक्षित डाॅक्टर क्या काम
के जो देश
द्रोही बने मचाते हाहाकार ।
कल का ही था वो समाचार
जो छाया रहा
आज तक मीडिया में, भरा था
अखबार ।
लिप्त रहे जो हिंसक प्रवृतियों में,
लानत है, ऐसे
शिक्षितों को
जो करते नर संहार।।
स्वरचित:अशोक दोशी