एक बार फिर से वो पुरानी हर याद ताज़ा हो गयी,
फिर दिल सजाया हाथ में
फ़रियाद ताज़ा हो गयी,
कैसे कहूँ कि देखकर
वर्षों पुरानी वो हंसी
ख़ुश हूँ या ग़म में हूँ मगर
हर बात ताज़ा हो गयी,
कैसे बताऊँ मन में और मस्तिष्क में
कुछ तो है कि द्वन्द फिर ऐसे छिड़ा है,
एक भाग पहुँचा है बहारों में परस्पर
दूसरा अब भी फिज़ाओं में खड़ा है,
फिर से वही वर्षों पुरानी दूरियाँ हैं
कि तुम उस तरफ हो और मैं हूँ इस तरफ
बस!
फ़र्क इस बार इतना सा है कि
न चाहता हूँ तुम रुको
न चाहता हूँ मैं रुकूं।