भाग ७०
भूमिपूजन का कार्यक्रम सही समय पर शुरू हो चूका था। ग्यारह बज कर पंद्रह मिनिट पर पूजा का मुहूर्त था। पंडित जी ने यजमान को आमंत्रित किया और यशवंतराव जी और पद्मावतीजी अपने पारम्परिक परिधान में उपस्थित हो गएं। गोमूत्र, गोबर से पूजा स्थल को पवित्र किया गया और रंगोली से सजाया गया था। ईटों से चौकोन बना कर चन्दन की समिधा से यज्ञकुण्ड सजाया गया था। पास में चाँदी की थाली में कुंकुम, हल्दी, चावल, बाती और घी से लबालब भरा दीपक, दूर्वा, अगरबत्ती, जल कलश तथा फूलमालाएं, माचिस सभी चीजें रख दी गई थी। अप्पा और पद्मावतीजी को बैठने के लिए लकड़ी के नक्काशीदार पाट रखें गएं थे।
अप्पा ने आसपास के गाँवो के लोगों को भी आमंत्रित किया था। वो जन-जन के मस्तिष्क में यह बात अंकित करना चाहते थे कि यहाँ बनने वाला 'जीवन दीप मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल' जिसका भूमिपूजन सम्पन्न हो रहा हैं, वह जन-जन के कल्याण और अच्छे, निरोगी स्वास्थ्य के लिए हैं। सही मुहूर्त पर भूमिपूजन आरम्भ हो गया। उन्होने यज्ञकुण्ड में पहली समिधा कराड के सब से बुजुर्ग नागरिक अण्णा गणपत जी के हाथों अर्पण कराई। उन्हें शाल, श्रीफल अर्पण कर, फूलमाला पहना कर अप्पा और पद्मावती जी उन्हें प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लिया और फिर पंडित जी के कहे अनुसार पूजा करने लगे। उन्होंने गणपत जी को पास में ही कुर्सी पर बैठाया और पूजा को सम्पन्न करने में जुट गएं।
पंडित जी ने मन्त्रोंचार के साथ पूजा शुरू की। यज्ञकुण्ड की पूजा कर उसे प्रज्वालित कर दिया था। विघ्नहर्ता की अर्चना के साथ माँ वसुंधरा तथा कुलदेवी की पूजा आरम्भ हो गई। विभा, यश, वज्र और वैदेही ने सभी आमंत्रितों की बैठने की व्यवस्था संभाल ली थी।
न तो यहाँ धर्म-जाती, अमीरी-गरीबी का भेद होगा न दलित-सवर्ण का। यहाँ सिर्फ इलाज होगा पीड़ित, वंचित, जरूरतमंद जनता का! इस बात को उन्होंने वहाँ एक दान पेटी रख कर निश्चित कर दिया था। विभा ने वहाँ सुन्दर बैनर बना कर लगाया था जिस पर लिखा था...
" बूंद-बूंद से सागर भरता, जन-जन की स्वेद-बूंदों से गागर भरती "
उत्साह और उल्हास के साथ भूमिपूजन सम्पन्न हुआ। उपस्थित सभी को चाय, कॉफ़ी के साथ मिठाई तथा नाश्ते के पैकेट्स दिए गए थे। पीने के पानी की टंकी भी लगी हुई थी और बिसलरी बॉटल के रूप में भी सभी जगह पर उपलब्ध था। सभी के चेहरे ख़ुशी से दमक रहे थे। सालों बाद इतना बड़ा समारोह कराड में हो रहा था जिसमें सिर्फ कराड के बाशिंदे ही नहीं, आसपास के छोटे-बढ़े गाँवो के लोग भी शामिल थे। अप्पा के परवरिश की जगह लोगों के दिल में थी। लोग यहीं दुआ कर रहे थे कि अप्पा को ईश्वर और शक्ति प्रदान करें ताकि वह मानवता की सेवा कर सकें।
पूजा सम्पन्न होने के बाद अप्पा यशवंतराव बोलने के लिए खड़े हो गए। उन्होंने सभी आमंत्रित महानुभावों का, गाँव के लोगों का तहेदिल से स्वागत किया और उनके सहयोग और योगदान के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होने सबको आश्वास्त किया कि इस अस्पताल में वो सब सुविधाएं, नामि-गिरामी डॉक्टर, संसाधन उपलब्ध होंगे जो आज मुम्बई जैसे शहर में उपलब्ध हैं। उन्होंने आम जनता कों आश्वास्त किया की अब गाँव में कोई भी अकाल मृत्यु, स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में नहीं होगी। उन्होंने सभी को गिलहरी का योगदान इस नेक काम में देने की विनती की और अस्पताल में बनने वालें कमरों पर नामपट्ट लिखाने के लिए बोलियाँ बोलने का काम आबा को सौंप दिया।
कुछ पल के लिए आबा अचंभित थे। इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी अप्पा ने मुझें! वह भाव-विभोर हो गए।
अप्पा सभी का धन्यवाद कर बड़े-बुजुर्गों से आशीर्वाद और दुआएं मांग कर अपने स्थान पर बैठ गए और उन्होंने अब माईक विभा को सौप दिया। विभा ने सभी को तन- मन-धन से इस कार्य में सहयोग देने की कर जोड़ कर सभी उपस्थित जन समूह को विनती की और आबा को आगे का कार्य सँभालने की विनती की।
आबा ने पहले तो अप्पा और सभी प्रतिष्ठित उपस्थित मान्यवरों का आभार व्यक्त किया और अपने पिता भास्करराव के चिरप्रयाण के बाद उनकी स्मृति में तीन लाख रुपएँ दान स्वरुप दिए और एक कमरे पर अपने पिता का नाम अंकित करवाने का प्रयास किया। । पहले ही आबा पांच लाख का ड्राफ्ट दे चुके थे अपने माता-पिता के नाम! सभी उनकी इस पहल से प्रसन्न थे। आबा सबको इस काम का महत्व समझा रहे थे। अपनी आपबीती को बताते-बताते उनकी आँखें भरे पैमाने सी छलक पड़ी। विभा ने उन्हें सहारा दिया। तभी यश के पिता प्रताप सिंह जी उठ खड़े हुए। उन्होंने अपने बेटे यश के नाम से एक कमरे पर नाम पट्ट की बोली तीन लाख रूपएँ में ली।
अब क्या था! एक के पीछे एक महानुभाव नाम लिखाने लगे। कमरे सिर्फ पैतालिस थे। 'पहले आओ और पहले पाओ' के तर्ज पर सभी कमरे आधे घण्टे में आरक्षित हो गएं। सरपंच से लेकर नगरसेवक, नेता से लेकर अभिनेता, वकील, डॉक्टर, आर्किटेक्ट सभी ने अपना योगदान देना उचित समझा क्योंकि अप्पा की कार्याप्रणाली में सबको विश्वास था। वो जानते थे अप्पा ने इस काम को संभाला हैं तो एक पैसे का भी हेरफेर नहीं होगा। अप्पा जीतने कोमल, संवेदनशील थे उतने ही गलत लोगों के लिए कठोर भी थे। समाज का एक रूपया भी वह व्यर्थ जाने नहीं देते थे।
आबा अप्पा की आभा से प्रभावित थे। जन-जन के मन में उनकी छवि एक ईमानदार समाजसेवी के रूप में अंकित थी। इर्द-गिर्द के इलाके में एक हॉस्पिटल की सख़्त जरुरत थी जिसे अप्पा ने समझा था और अपनी अथक मेहनत और अगम्य साहस से उन्होंने इस स्वप्न को साकार करने का प्रयास किया था। गाँव की दुआएं उनके साथ थी तो फिर असफलता का डर काहे का?
इस प्रोजेक्ट से गाँव के कई युवाओं को रोजगार मिलने की अपार संभावना थी। उन्होंने कार्यक्रम के बाद सभी मान्यवरों से मीटिंग रक्खी थी। वो आज से ही काम शुरू करना चाहते थे। युवाओं को वह इस प्रोजेक्ट से जोड़ना चाहते थे। उन्हें सिर्फ काम को पूजा समझने वाले युवाओं की जरुरत थी। सभी कार्य वो आम सहमति से करने में विश्वास करते थे।
अच्छी नीयत से किए जा रहे जन कल्याण के कार्य को जब जनता सिर पर उठा लेती हैं जैसे की पद्मावती देवी तीर्थंकर को तो कौन उसे पूर्णता की ऒर ले जाने से रोक सकता हैं? अप्पा जानते थे कि जनता का एक-एक रूपया जब कार्य में लग जाता हैं तो न पैसे की कमी होती हैं न श्रम की!
एक शुभ कार्य का शुभारम्भ हो चूका था डंके की चोट पर, अथाह जन-सागर के सामने...जन-जन के कल्याण और बेहतरी के लिए! युवाओं की उम्मीदों को अग्निपँख लग गए थे! उड़ान भरने के लिए नीला आकाश स्वागतम् सुस्वागतम् का गीत गुनगुना रहा था। दिल से दिल और हाथों से हाथ जुड़ चुके थे! काम कठिन था लेकिन जब युवाशक्ति जुड़ गई तो अवरोधों की चट्टाने टुकड़ों में बिखर गई थी और स्वप्नपूर्ति की आभा चहुँऒर फ़ैल चुकी थी और लोग-बाग अप्पा को दुआएं दे कर गौरवान्वित कर रहे थे...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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