मन आवेग
रोके हम आवेग को, कसना विनय लगाम।
बंधन मर्यादा भला, लगती प्रकृति ललाम।।
लगती प्रकृति ललाम, सादगी हर दिल जीते।
प्यासा हो इंसान, प्यास बुझती जल पीते।।
खिलता मन मधुमास, प्रेम से कोई टोके।
पिया करे मनुहार, प्रीत आवेग न रोके।।
स्वरचित मौलिक रचना
चंचल जैन
मुंबई, महाराष्ट्र