कुण्डलिया छन्द - श्रमिक!
अविचल राही मार्ग का, चलता कंटक भूल |
संभल-संभल चल श्रमिक, पथपर पत्थर-धूल ||
पथपर पत्थर-धूल, कोहरा जग में छाया |
निर्माता के हाथ, ठीकरा खाली आया ||
निर्धन, भूखा लाल, सिर्फ दो रोटी चाही |
शोषित-वंचित जीव, मार्ग का अविचल राही ||

रोटी-बाटी के लिए, फिरते जग मजबूर |
माथे पे ले छाबड़ा, भरते डग मजदूर ||
भरते डग मजदूर, छुपा पैरों के छाले 
करते श्रम भरपूर, कौन दे बैठे-ठाले?
खाली होगी जेब, मिले बस तन-लंगोटी |          तरसे बालक रोज, मिले बस बासी रोटी ||

रेखा हाथों की मिटी, ढ़ोते-ढ़ोते रेत|
सपने सारे हैं दफ़न, बंजर मन के खेत ||
बंजर मन के खेत, आज-कल का निर्माता |
धूप-छाँव के बीच, देश-जग में गुण गाता ||
पाई-पाई जोड़, गढ़े किस्मत का लेखा |
पत्थर दिल को तोड़, हँसी छालों में रेखा || 

मिट्टी-गारा टोकरी, माथे रख मजबूर|
चिथडे पहने नित चले, पथ पथरीला दूर ||
पथ पथरीला दूर, स्वेद बूंद से सुगंधित | 
सिक्कों की बरसात, श्रमिक महिमामंडित || 
शहंशाह की धुन, कलाकार को नकारा |
ताज तले कर दफ़न, श्रमिक तन समझें गारा ||

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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