सपनों की उड़ान!

"नारी तू नारायणी" प्रतियोगिता हेतु कविता :-
विषय- सपनों की उड़ान 

जागी चेतना नारी की,नभ में स्वप्न सुहाने,
संघर्षों के कठिन शिखर अब उसके पहचाने।

विपदाओं की भीषणता में साहस दीप जलाती,
अदम्य धैर्य के दृढ़ पंखों से नारी उड़ती जाती।

अंतर में आकांक्षा-अग्नि,दृढ़ संकल्प प्रज्वलित,
हर अवरोध मिटाने को उसका मन है उल्लसित।

वह जननी,वह शक्ति-प्रेरणा,जीवन की धारा,
उसके श्रम से आलोकित यह संसार हमारा।

तूफानों से जूझकर भी पथ से न कभी विचलती,
तप्त भू की कठिन घड़ी में आशा बन दमकती।

ज्ञान-ज्योति से आलोकित कर अज्ञानता हरती,
नव सृजन की पावन वीणा जग में नित भरती।

स्वप्निल पंख पसार वह गगन-विहार करती,
अपने श्रम-साधन से नित इतिहास नया रचती।

बंधन की जर्जर दीवारें अब समक्ष न रुकें,
दृढ़ निश्चय के वज्र प्रहार से अवरोध सब झुकें।

ममता,मेधा,मर्यादा की अद्भुत वह पहचान,
नारी-स्वप्नों की यह उड़ान युग-युग का गान।

नवयुग की उषा बन वह जग ज्योति जलाती,
स्वप्नों की उन्नत उड़ान से राह नई दिखाती।

मंजूषा दुग्गल
शिक्षिका/ कवयित्री/ लेखिका 
करनाल (हरियाणा )

द्वारा Manjusha Duggal
Shared06 Mar 2026
Start 05 Mar 2026
End 05 Mar 2031
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