'वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी, वो फूलों पर मंडराते भँवरे, वो रंगबिरंगी तितलियाँ, वो मिट्टू की बातें..वो चिड़ियों का चहचहाना, वो पत्तों का सरसराना, वो कोयल की कुहुँ-कुहुँ, वो तोता-मैना की बातें, वो बादलों का जमघट,वो पेड़ों के झुरमुट से झांकती किरणे, वो सूरज की मुस्कराहट, वो खिले-खिले गुलाब, सब कुछ तो पीछे छूट गया हैं इन बच्चों का ...…
अभिभावकों की ऊँगली थामे चलने की अधूरी चाहत लिए नन्हे कदम बढ़ाते-बढ़ाते, मजबूत कन्धों पर बैठ दुनियाँ निहारने के सपने देखते- देखते,... विकास की दौड़ में बढ़ते अभिभावकों, हितचिंतकों, रिश्तेदारों की भीड़ में बिछड़ कर न जाने कब पहुँच गए वो एक सँकरी, अँधेरी सुरंग की ओर… जहाँ है तो सिर्फ जानलेवा अकेलापन, … अनचाहा सन्नाटा … डरावने साये और जानवर से भी बदतर इंसानी दरिंदों की बस्तियाँ !
गर्भ में ही मार डालनेवाली माँ क्या कभी सुन पायेगी बेटी की चीख़ ? क्या आया की गोद में पलते बच्चे को मिलेगी प्यार की नमी? पैसों की ख़नक के बीच क्या सुन पाएंगे अभिभावक अपने बच्चे की दिल की आवाज? इलेक्ट्रॉनिक गैजट्स की चकाचौध में क्या नजर आएगा माता-पिता को बच्चे के मन में पनपता अँधेरा? वीडियो गेम्स के शोर के बिच क्या सुलझेंगी बच्चे के जेहन की गुत्थियां? क्या रोज नए खिलौने, नए उपहार पाट पाएंगे माँ-बाप, भाई-बहन,नाना-नानी, दादा-दादी के बिच की दूरियाँ ? क्या अडोसी पडोसी रोक पाएंगे बच्चों के यौन-शोषण के अनकहे,अनचाहे दर्दनाक किस्से?
प्यार की बगिया की नन्ही पौध हैं यहाँ! क्या सींच पा रहे हैं हम उसे पूरी शिद्दत से, जिम्मेदारिसे से? क्या बचा पा रहे हैं हम उन्हें किट-पतंगों से? जरा सी आपादाएं, जरा सी तपन, जरा सी अनदेखी, जरा सी सख्ती और जरा सी लापरवाही कहीं छिन न ले हमसे हमारी बहुमूल्य दौलत!
स्वरचित तरह मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |