अपाहिज बेटी ने, तमगे जीते भारी
राष्ट्र सम्मान बढ़ाए, जन-जन दुलार पाए ।
विपदा सदैव आई, अटल रहे मनसूबे।
मन में है जब ठाना, जान मर्म सब पाए ।
भिक्षा-शिक्षा-दीक्षा, गुरुकुल की हैं बातें।
जीवट से ही यारों, ज्ञानी निदान पाए।
मत्स्य बिंधने बन्दा, रखें लक्ष्य पर आँखें।
श्रीहरि बोले गीता , पार्थ ध्यान दे पाए।
लालन-पालन सच्चा, देती अक्सर ऊर्जा।
चुनौतियों को न्योता, दे संज्ञान बढ़ाए।
नहीं सुलभ है जीना, लड़ना अवरोधों से।
जीत सके जो स्पर्धा, ध्वज उत्थान बढ़ाए।
दुर्लभ है मनचाहा, आसानी से पाए।
थाम तिरंगा राही, माँ यशगान सुनाए।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।