ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.... भाग ४३

भाग ४३

वैदेही सुबह के स्वप्न में खो गई थी! विनय उसके गालों पर थपकियाँ दे उसे जगा रहा था.. हाथ में डफली लिए वह मुस्कुरा कर बोला, " हेलो माय ड्रीम गर्ल! आप सब ने मुझें बिल्कुल निराश नहीं किया! पल-पल मुझें महसूस हुआ कि मैं तुम्हारे बीच खड़ा डफली बजा कर सबको पुकार रहा हूं और उन्हें कह रहा हूं... "देखा! अंगदान का कमाल! वज्र ने अपने साथ मुझे भी जिन्दा रक्खा हैं! वैदेही! कितने अच्छे हैं सब लोग! मेरे माता-पिता का इतना सम्मान! मैं अभिभूत हूं यार! दोस्त हो तो ऐसे...मेरी मित्र मण्डली जैसे! वज्र, विभा, यश और वैदेही तुम!  गज़ब ढाया आपने! कैसे शुक्रिया अदा करूँ तुम्हारा? डफली बजा कर? झूम-झूम कर? "
दूसरी बार बजी बेल ने वैदेही को स्वप्न लोक से निकाल कर यथार्थ के धरातल पर ला पटका था! वैदेही ने आँखें मलते-मलते दरवाजा खोला। दूधवाले के पास ही वज्र खड़ा था! 
'हेलो वैदेही! सुप्रभात! गुड मॉर्निंग डिअर! अभी भी सपने में ही हो क्या? जाओ! बर्तन लेकर आओ! दूध लेना हैं न!"
वैदेही ने दूध लिया और मुस्कुरा कर बोली," क्या बात हैं? बड़ा मूड में लग रहा हैं हैंडसम! कल का खुमार उतरा नहीं न? "
दोनों हँसने लगे! दोनों रसोईघर में गएँ! वैदेही ने चाय बनाई, ऊपर के कपाट में रक्खे डिब्बे से नमकीन, खारे बिस्किट्स और चिवड़ा निकाला और दोनों बैठ गएँ ड्राइंग रूम में..चाय की चुस्कियों के साथ कल के कार्यक्रम की चर्चा करने! अभी चाय के दो घूंट भी गले से नहीं उतरे थे कि यश और विभा ने बंगले के फाटक को खोला और सीधा अंदर आ कर बिस्किट्स की प्लेट में हाथ मारा मानों कोई नटखट, शैतान बच्चा घर में प्रवेश कर चूका हो! 
"यार! अरे! कुछ तो शर्म करों यार! अकेले-अकेले   चटाचट कर रहे थे नमकीन, बिस्किट्स! दोस्त का जरा भी खयाल नहीं आया?"
तभी विभा बोल पड़ी," वज्र! क्या 'गुटर गु' चल रहा था यार? हम से छुपायेगा? और वैदेही, "एक फोन तो करती! हम भी आते नाश्ता करने! इस 'बुद्धू' का ही इतना लाड़- दुलार क्यों भई?"
सभी हँसने लगे। वज्र बोल पड़ा, "अरे! मैं नहीं आता तो  चाय-दूध भी नसीब नहीं होता हम सबको! बेचारा दूधवाला बेल मार-मार कर थक गया..यह महारानी स्वप्न-लोक में भटक रहीं थी!"
सबने फिर से मिल कर ठहाके लगाएं! यश बोल पड़ा, " यार विभा! तू बंदरिया के रोल एकदम 'फिट और हिट' लग रही थी! असली बंदरिया होती न, तो तुझ से जल-भून कर तुझे नोच डालती! पूरा हॉल हिला दिया था यार इसने तो... "
"यह बात तो यश की सौ प्रतिशत सही हैं यार ! तीनों एकसाथ बोल पड़े! यश बीच में ही बोल पड़ा! "विभा! एक बात सच-सच बताना! कहीं तू पिछले जन्म में.... उसका वाक्य पूर्ण होने से पहले ही विभा ने पास में रक्खा झाड़ू उठाया और वह यश के पीछे भागने ही वाली थी कि उसे कुछ खयाल आया और वह एक तरफ खड़ी हो गई! यश भी मुस्कुरा कर सोफे पर बैठ गया और वैदेही उन दोनों के लिए चाय बनाने चली गई। वज्र ने यश और विभा को नितीन सर के बारे में पूछा! 
यश खुश था नितीन सर ने उसके नाम को आगे किया था और गौरव सर से बात कर यश के लिए तारीख नक्की कर दी थी! विभा को भी अब नियमित रूप से प्रैक्टिस के लिए जाना था बैडमिंटन कोर्ट पर!
वैदेही चाय लेकर आई! वज्र और खुद के लिए आधा- आधा कप और विभा और यश के लिए दो कप पुरे भर कर लायें थे, साथ में चिवडा भी!
यश को लख़नऊ जाना पड़ेगा यह सुनकर सभी के चेहरे पर ख़ुशी और गम के भाव इंद्रधनुष से उभर आएं! सुनहरी धूप के बीच सुहावनी बूंदा-बाँदी! एक तरफ यश का उज्जवल भविष्य और दूसरी तरफ उसकी जुदाई, मानों मित्र-मण्डली की रुह का खो जाना! उड़ते परिंदे के पर उसके चाहने वाले कैसे छांट सकते हैं अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए? 
एक तरफ विभा को राष्ट्रीय खेलों में मुम्बई का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिल रहा था तो दूसरी तरफ वज्र को पैरालिंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रशिक्षण, चुनाव का मौका! सभी जानते थे ऐसे मौके बार-बार नहीं आते! आखिर वो प्यार कैसा, जो परिंदे के पर कतर दें?

वज्र ने वैदेही के बारे में भी बताया! उसकी कोशिशों को, माँ को मदद करने के भाव की सराहना की और अपनी तरफ से सबने वैदेही को शुभकामनाएं भी दी।
तभी वैदेही के फोन की रिंग टोन सुनाई देने लगी। माँ का फोन था.. उसने 'एस्क्यूज मी' कह कर फोन उठाया और वह एक तरफ चली आई! वैदेही की माँ उसकी चिंता कर रही थी कि वह घर में अकेली हैं लेकिन जैसे ही उसने मित्र-मण्डली की उपस्थिति की बात कहीं तो माँ ने राहत की सांस ली! उसने बताया कि वो सब अब 'गेट वे ऑफ़ इंडिया' से निकल कर 'काला घोड़ा' की तरफ जा रहे हैं! वहाँ आर्ट गैलरी देख कर वो मुम्बई स्टॉक एक्सचेंज, ब्रिटिश लाइब्रेरी, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से गुजर कर आगे 'प्रिंस ऑफ़ वेल्स म्यूजियम' जिसका नाम आज 'छत्रपति शिवाजी महाराज वस्तु संग्रहालय' हैं उसे देखने जाएंगे। 
वैदेही ने माँ को इतना खुश कभी नहीं देखा था। उसके स्वर में गज़ब का उत्साह और आत्मविश्वास था। वैदेही समझ गई आज कई दिनों बाद माँ खुले आसमान तले स्वच्छन्द घूम रही हैं, प्रकृति का दिल खोल कर आनन्द लें रही हैं तभो दोस्तों का खयाल आया और उसने 'रात को बात करते हैं... ' कह कर फ़ोन काट दिया! 
वज्र, यश और विभा भी आज खुश थे! कई दिनों के तनाव के बाद आज उनके अभिभावक अपनी ज़िन्दगी जी रहे थे। सभी ने आबा की कोशिशों की खूब दिल खोल कर तारीफ़ की और अब मित्र-मण्डली की चर्चा कल के नाटक के मंचन पर आ ठहरी। 
वैदेही  कब से कश्मकश में थी! उसने वज्र से कहा, "एक बात कहूँ? तुम लोग सब मुझ पर हंसोगे तो नहीं?"
वैदेही का सवाल सुन पहले तो सब हँस पड़े और बाद में वज्र सहित सबने उसे गंभीरता से लेकर पूछा, " वैदेही! क्या बात हैं? बोलो...बोलो वैदेही! खामोश क्यों हो!"
"आप सब मेरा भरोसा करोगे?" वज्र ने उसके कन्धे पर हाथ रक्खा, " बोलो वैदेही! हम सबको तुम पर पूरा भरोसा हैं "
'आज सुबह तुम ने बेल मारी तब मैं सपने में थी। विनय आया था मेरे सपने में! उसने अपने नाटक की प्रशंसा की और सबको बधाई भी दी। वह कह रहा था मैं वज्र के रूप में तुम्हारे बीच हूं! वह डफली बजा रहा था। नाटक की कामयाबी का डफली बजा कर जश्न मना रहा था और बेल बजी! मैं हड़बड़ाकर जाग गई!"
सभी निशब्द थे! उन्हें पता था वैदेही जो कुछ कह रही हैं, वह सच ही होगा! विनय आज भी उनके जेहन में जिन्दा था और वज्र की तो धड़कन था वह! वज्र ने वैदेही का कन्धा दबाया! सभी के आँखों से आँसू बह रहे थे और सभी एक-दूसरे के आँसू भी पोंछ रहे थे!
माहौल को गमगीन होते देख यश बोल पड़ा, "थ्री चियर्स फॉर विनय... हिप हिप हुर्रे..."
और सब हँस पड़े! खुशी और गम के मिले-जुले आँसूओं के बीच विनय की धड़कनों का स्पंदन मानों श्वेत वर्णी गंगा और श्यामल वर्णी यमुना के बीच अदृश्य सरस्वती!  और उनका दुर्लभ त्रिवेणी संगम तीर्थंराज प्रयागराज में!
असमय हुई बारीश सभी के मन का बोझ बहा ले गई और सबका मन हल्का कर गई। सभी फिर से जुट गएँ...
नए सपनों के वस्त्र आढ़े-खड़े धागों से बुनने में...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में..


इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • वाह! बहुत सुन्दर
  • बहुत ही सराहनीय है। इसे पढ़कर मुझे बहुत खुशी हुई