शीर्षक : प्यार की बरसात...
गोधूलि की बेला है,
सूरज निहायत अकेला है,
आसमान ने लालिमा खोई है,
घंटों निशा की राह जोई है!
चाँद ने उपवस्त्र लहराया है,
धरा को उबटन लगाया है!
दुधिया चांदनी में नहलाया है,
इत्र छिड़क तन-मन महकाया हैं!
लड़खड़ाते कदमों की आहट सुन,
चाँद फलक पे आया है,
बुजुर्गों की तन्हाईयों का साथी,
होले-होले मुस्कुराया है!
क्यों ढूंढ़ते हो उन परिंदों को,
जो लौट के घर न आयेंगे?
सात-समंदर पार उड़े परिंदे,
क्या मातृभूमि को लौट पाएंगे?
रिश्तों की उलझी पहेली,
क्या वक़्त सुलझा पाया है?
विदेशी धरती की चमक-दमक,
क्या आँखों के तारे लौटा पाया हैं?
प्यार की बरसात में उठी लहरे,
क्या साहिल को चूमने दौड़ी हैं?
पैरों तले से रेत खींच कर,
बेदर्दी! गहराईयों में जा पहुँड़ी हैं!
आँखों के पैमानों से छलकते अश्क़,
बिखरने न देना माँ के प्यारे!
दुआओं की बारिश में भीगा आँचल,
देगा सुकून, होंगे वारे-न्यारे!
इत्तु सा समय, इत्तु सा सम्मान-सुमति,
देगा अनुभव की अक्षय थाती,
प्यार की बरसात में भीगी बाती,
प्रज्वलित करेगी जीवन-ज्ञान-ज्योति!
निशा के गर्भ में पलेगा आदित्य,
स्वर्णिम भोर लायेगा नित्य!
चहूँऒर बिखेरेगी रश्मियाँ लालित्य,
चहकेंगे परिंदे, डालियाँ करेगी नृत्य!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!