ये कैसी घड़ी है आई?

 

शीर्षक : ये कैसी घड़ी है आई?

ये कैसी घड़ी है आई?

कौआ चुग रहा मोती, हंस चुग रहा दाना!

झूठ दे रहा चुनौती, सच हो गया बौना!

 

ये कैसी घड़ी है आई?

न्यायदेवता नि:शब्द-बन्धुआ, गुंडे बेखौफ़!

लोकतंत्र-मन्दिर अगुआ, मन में रहे खौफ़!

 

ये कैसी घड़ी है आई?

अन्नदाता करे आत्महत्या, चूहें करें मौज!

कुपोषण से बेहाल, सड़े भविष्य की पौध!

 

ये कैसी घड़ी है आई?

बलात्कारी घूमे बाज़ार, दे मूछों को तांव!

पीड़िता जियें मर-मर,अपराधी खेले दाँव!

 

ये कैसी घड़ी है आई?

प्रकृति दे जीवनदान, मानव करे विनाश,

महामारी मुँह फैला करें,सुख, समृद्धि का नाश!

 

ये कैसी घड़ी है आई?

धर्म, संप्रदाय के नाम पर हिंसा-रुदन जारी,

मानवता बिलख रही, हत्यारे बने प्रभारी!

 

ये कैसी घड़ी है आई?

युद्ध-ज्वाला महाशक्तियों ने हैं भड़काई!

नारी-नौनिहाल बने भक्ष्य, हर्षित हैं आतताई!

 

स्वरचित एवं मौलिक,

द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |

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