ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.. भाग ४६
भाग ४६

वज्र और वैदेही महाविद्यालय में अपनी कक्षा में पहुँच चुके थे। पहला पीरियड आज प्रिंसिपल साहब का था। कक्षा में प्रवेश कर उन्होंने सभी का अभिवादन किया और वैदेही को आगे बुलाया। सभी के चेहरे पर प्रश्नचिन्ह था लेकिन अगले ही पल प्रिंसिपल साहब बोल पड़े, " आज हमें गर्व महसूस हो रहा है कि इस कक्षा की छात्रा वैदेही श्री जानकी जाधव ने इस महाविद्यालय का नाम रोशन किया है! 'राष्ट्रीय स्लोगन प्रतियोगिता' में उसके स्लोगन को विजेता श्रेणी में शीर्ष पर रक्खा गया तथा इस उपलब्धि के लिए उसे ग्यारह हज़ार का ड्राफ्ट तथा प्रधानमंत्री जी को मिलने का मौका तथा भारत सरकार द्वारा आयोजित 'युवा स्पन्दन' के कार्यक्रम में भाग लेने का निमंत्रण भी दिया गया है! यह हमारे लिए और भी अभिमान की बात है कि एक शहीद की होनहार, मेधावी बेटी ने हमें फिर से गौरवान्वित किया है और विशेष बात यह है कि कार्यक्रम में वैदेही को पांच मिनट का समय भी दिया गया है अपने विचार व्यक्त करने के लिए! महाविद्यालय की कार्यकारणी उसका तहेदिल से अभिनन्दन करती है तथा उसे उसके उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाएं देती हैं!"
पूरा क्लासरूम तालियों की गड़गडाहट से गूंज उठा! वैदेही ने एक बार वज्र की ऒर देखा। उसकी आँखों की चमक और चेहरे के हास्य ने उसके मन को सुकून पहुँचाया। प्रिंसिपल साहब के पैर छू कर, सबका धन्यवाद ले कर वह अपनी जगह पर आ कर बैठ गई। पास बैठे वज्र ने उसकी पीठ थपथपाई, हाथ मिला कर अभिनन्दन किया और एक मुस्कान दे कर उसे अनन्त बधाईयाँ दी।

कच्छा-बनियन पहन नींव की खुदाई करते मजदूर को अचानक धरती के भीतर से सुवर्ण मुद्राओं से भरा कलश मिल जाये तो जो ख़ुशी उस मजदूर को होती है उसी ख़ुशी का अनुभव वैदेही कर रही थी! पुरस्कार से भी ज्यादा कीमती थे प्रिंसिपल साहब के वो शब्द जिसमें उन्होंने वैदेही के पिता को शहीद कह कर सम्बोधित किया था! आज वह खुद को बहुत भाग्यशाली समझ रही थी की वह श्री की बेटी हैं...एक शहीद की बेटी हैं!

आज भी मित्र-मण्डली कॉलेज की लायब्ररी में ही मिलने वाली थी! यश को लखनऊ जाना था। तारीख निश्चित हो चुकी थी और सवाल सिर्फ इतना सा था कि यश के साथ कौन जायेगा? सभी पिरियडस ख़त्म होते ही सभी लायब्ररी में पहुँच गएँ। वज्र ने वैदेही की खुशखबरी दी और पूरी लायब्ररी तालियों से गूंज उठी! 
यश बोल बड़ा, " छुपा रुस्तम हैं यार! पहली ही बार पिच पर बैटिंग करने गई और पहली ही बॉल को सीधा स्टेडियम के बाहर पहुंचा दिया! ग्रेट यार! वुई आर प्राउड ऑफ़ यू वैदेही! "
"बहुत गर्व महसूस हुआ यारों! उत्सव होगा... बड़ी शिद्दत से होगा! सुना साम्बा... जयपुरी मुरब्बा! सेलिब्रेशन होगा! आज ही होगा! कल किसने देखा? " विभा अपनी चिरपरिचित शैली में बोल पड़ी!
तभी यश बोल पड़ा, " जरूर होगा! हे राधे माँ! जश्न होगा! धूमधाम से होगा! आज और अभी.. इसी वक़्त ...एक आइसक्रीम...वैदेही के नाम....मुँह मीठा करना तो बनता ही हैं !"
सब हँसने लगे। वज्र ने सब को खामोश रहने का इशारा किया! वह बोल पड़ा, " यार! लायब्ररी में बैठे हैं हम! थोड़ा अनुशासन यार... और विभा ने सबकी ऒर देख कर होठों पर उंगली रख दी!

बहारों का मौसम था। हसीन लम्हें थे। आज न पात के झडने की पीड़ न कुसुम के मुरझाने का डर! फ़िजा में गज़ब का आकर्षण था। आसमान स्वेत-धवल बादलों से पटा हुआ था! ऐसा लग रहा था मानों नन्दलाल ने माखन की मटकी फोड़ दी हैं, कुछ  माखन माखन चोर ने और कुछ उसके मित्रों ने चख लिया हैं, उनके नन्हें, सुकोमल गालों पर नवनीत चिपका हैं और बचा-खुचा माखन धरती -आसमान में बिखर गया हैं!

सभी 'नेचरल' के आइसक्रीम पार्लर में पहुँच चुके थे! सब ने वैदेही को 'थ्री चिअर्स' किया और टूट पड़े अपनी पसंदीदा आइसक्रीम पर! 

जीत का जश्न मनाने का मजा ही कुछ और होता है! सालों की तपस्या के बाद हासिल होता हैं ऐसा मौका! मुश्किलों के दौर तो चलते रहते हैं, विपदाएं आती हैं तो अकेली कम सखी-सहेलियों के साथ ज्यादा आती हैं पर खुशियाँ, जीत का जश्न मनाने के मौके.. विरले ही होते हैं, बिल्कुल बारह साल बाद आने वाले महाकुम्भ से! ऐसे में क्यों न इस त्रिवेणी संगम के अद्भुत मौके पर पवित्र धारा में डुबकी लगा कर जीवन को जीने लायक, तेजोमय बनाया जाय?
जीवन में आए ही हम इसलिए हैं कि हम खुशियाँ बाँटे, गमों को हवा में उड़ा कर जश्न मनाएं! किसी के ज़ख्म पर 
मरहम लगाएं और हर पल को बच्चें सी मासूमियत से जियें!
ख़ुशी के पल पँख लगा कर उड़ जाते हैं और समय का खयाल ही नहीं रहता! बारह बज चुके थे। वैदेही ने काउंटर पर जा कर कार्ड से पेमेंट किया और सब निकल पड़े अपने-अपने घरौन्दे की ऒर जहाँ उनके अपने उनका इंतज़ार कर रहे थे।

शाम को विभा और यश को बैडमिंटन की प्रैक्टिस के लिए जाना था! वैदेही के पास भी वक़्त कम था दिल्ली जाने की तैयारी करने के लिए! जानकी जी तथा वैदेही की मुम्बई-दिल्ली फ्लाइट की दो टिकिट्स आ चुकी थी! 

वैदेही को सिर्फ जाने-आने की तैयारी ही नहीं करनी थी बल्कि वहाँ जो वक्तव्य देना था उसकी भी तैयारी करनी थी! 'युवाओं की आत्महत्या' विषय बहुत ही गंभीर तथा संवेदनशील था! एक-एक शब्द तोल-मोल कर बोलना जरुरी था! आए दिन प्रतियोगिता परीक्षाओं के केंद्र कोटा में हो रही छात्र-छात्राओं की आत्महत्या की घटनाओं ने सरकार के शिक्षा मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय तथा सामान्य जनता को झकझोर कर रख दिया था। युवाओं की आत्महत्या पर विचार-विमर्श करने, युवाओं की भावनाओं को जानने-समझने तथा इस दुश्चक्र की रोकथाम के लिए सही कदम उठाने को सभी को मजबूर कर दिया था! 

वैदेही जानती थी इस विषय पर युवा दिल खोल कर उसके सामने अपनी पीड़ा को बयाँ कर सकते हैं!  मित्र-मण्डली से विचार-विमर्श कर उसे बहुत कुछ नएं, महत्वपूर्ण तथा दूरदृष्टी से सुझाये गएँ प्रस्ताव मिल सकते हैं और इसीलिए उसने विभा से फोन पर बात की और कल दोपहर का समय इस विषय पर बात करने के लिए निश्चित किया।

वज्र ने वैदेही को घर के बाहर छोड़ा और वह घर की ऒर निकलने ही वाला था कि उसे दादा जी की आवाज़ सुनाई दी। उसने ड्राइवर को रुकने के लिए कहा तभी उसके कानों में आबा की हँसी पड़ी और वह समझ गया कि आबा वैदेही के यहाँ ही हैं! वह वहीं उतर गया और वैदेही के पीछे-पीछे घर में चला गया!

वज्र को देख भास्कर राव बहुत खुश हुए! जानकी जी ने आबा को वैदेही की सफलता के बारे में बताया तो वो भी बहुत खुश हुए और बाबा यानि की वज्र के दादा जी को लेकर चले आएं जानकी जी को बधाई देने!
बच्चों के खुशियों से दमकते चेहरे देख किन अभिभावकों को ख़ुशी नहीं होगी? वैदेही की सफलता के अपने मायने थे! निरन्तर कोशिश, अटूट विश्वास, अद्भुत धैर्य और असीम लगन से ही तो पथरीली राह के पथिक को गंतव्य  तक पहुँच कर मंजिल को पाने का सौभाग्य मिलता हैं! सभी ने जानकी जी तथा वैदेही को दिल खोल कर आशीर्वाद दिया और मनुहार के बावजूद भी भोजन के लिए घर की ऒर निकल पड़े!
वज्र और वैदेही को भास्कर राव बचपन से ही जानते थे! उन्ही के आँगन में खेल-कूद कर दोनों यौवन की दहलीज पर पहुंचे थे! पुराना जमाना होता तो अब तक तो वैदेही अपने ससुराल में होती और वज्र नन्हें-मुन्ने का बाप!

वैसे तो पुरानी हड्डियाँ जानती हैं कब भावनाओं को उछाल कर अपनी बात मनवानी हैं और कब अपने चिरप्रयाण की संभावना को भुनाना हैं! लेकिन यहाँ बाबा अच्छी तरह जानते थे कि उनका बेटा बहुत ही व्यावहारिक धरातल पर मजबूती से खड़ा रह कर निर्णय करता हैं न कि भावनाओं में बह कर या सिर्फ दिमाग़ से सोच कर!


आबा की 'फॉरचुनर' देख अन्नपूर्णा ने भोजन परोसने की तैयारी कर ली। वज्र की दादी लक्ष्मीबाई और प्रतिभा जी डाइनिंग टेबल पर पानी वगैरा रखने में मदद कर रही थी!
पूरा परिवार आज साथ था! वज्र ने अपने मोबाइल से एक फोटो लिया और सब के साथ खुद खड़ा रह कर छोटू को फोटो लेने को कहा! उसने अंत में जबरदस्ती अन्नपूर्णा और छोटू को साथ खड़ा कर और एक छायाचित्र क्लीक किया और सुनहरी यादों के संदूक में इन दुर्लभ पलों को संजो कर रख दिया भविष्य के लिये !

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में....


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