भाग २०
आबा की खुशी का ठिकाना नहीं था.. 'इंडो-नेपाल सांस्कृतिक मंच' द्वारा विनय के माता-पिता का सम्मान करने का निर्णय आज कार्यकारिणी समिति में पास हो गया था! सभी सभासदों ने इस निर्णय का तहेदिल से स्वागत किया और साथ-साथ वज्र की लम्बी उम्र के लिए प्रार्थना भी की! आबा ने गदगद हो कर सबका धन्यवाद किया और भीगी आँखों से सब से विदाई ली!
घर की तरफ आते-आते उन्होंने कई बार सिद्धिविनायक को याद किया और उन्हें हाथ जोड़ कर वंदन किया! आशा की अंतिम किरण भी जब लुप्त हो जाती हैं तब कृपानिधान परमात्मा का ही तो सहारा होता हैं! आबा भावुक हो गए थे! उन्होंने रुमाल से आँखें पोछी, गाड़ी के दरवाज़े में रखी बोतल से दो घूंट पानी पिया और फिर मोबाइल पर आएं सन्देश देखने लगे... कभी-कभी मोबाइल भी अंतरमन को बड़ी राहत देता हैं..करीबी मित्र सा..बिन बोले ही बहुत कुछ समझ जाता हैं...पुरानी यादों के बेशकीमती लम्हें साँझा कर दिल बहला देता हैं!
वज्र की बचपन की तस्वीर देख आबा अभिभूत हो गए! प्रतिभा जी के साथ सूट-बूट में खड़े आबा और दोनों के बिच में खड़ा वज्र.. स्मृतियों के पट जैसे-जैसे खुल रहें थे वैसे-वैसे आबा अधीर हो रहें थे! अचानक गाड़ी के रुकते ही वह सामने की सीट से टकराए और यथार्थ की दुनिया में आ पहुंचे..
वज्र अभी तक आया नहीं था कॉलेज से! आबा ने घड़ी देखी.. अभी तो सिर्फ साढ़े ग्यारह बजे है.. आबा खुद ही खुद की बेवकूफी पर हँसने लगे! कभी-कभी आबा भी मासूम बच्चा बन जाते थे... उनका यह भोलापन ही उनके भीतर के बच्चे को जिन्दा रखें हुए था!
आबा जानते थे आज सब मित्रमंडली वैदेही के यहाँ नाटक की प्रैक्टिस के लिए आने वाली हैं! उन्होंने अन्नपूर्णा को सूजी के लड्डू बनाने के लिए कहा साथ में हिदायत भी दीं कि जब वज्र वैदेही के यहाँ जाएं तो उसके साथ पीतल के डिब्बे में डाल कर ये लड्डू भी देना!
आबा आरामकुर्सी पर बैठ टीवी देखते-देखते वज्र का इंतज़ार करने लगे.. तभी उन्हें अपने पिताजी का खयाल आया! दो-तीन दिन से उनकी तबियत कुछ नरम-गरम थी! उन्होंने उसी पल फ़ोन लगाया...फ़ोन प्रतिभा जी ने उठाया! न जानें क्यों, उन्हें अपनी पत्नी की आवाज कुछ सहमी-सहमी सी लगी.. उन्होंने अगले ही पल पूछा, "प्रतिभा! काय लपवतेस माझ्या पासून? हा हुन्दका...आई-बाबा कशे आहेत?" फ़ोन में सुनाई दे रही रोने की आवाज से आबा असहज हो गए! उन्होंने फ़ोन कट किया और अपने मुनीम जी को फ़ोन लगाया! एक ही मिनिट में उन्होंने सारी गुत्थी सुलाझा दीं! पिताजी को रात में सांस लेने में दिक्कत हो रही थी इसलिए ICU में रखना पड़ा था.. अब उनकी स्थिति कुछ स्थिर थी! आबा ने उन्हें कुछ जरुरी निर्देश दिए और फ़ोन पर थोड़े-थोड़े समय में जानकारी देने को कहा! यह भी हिदायत दीं कि रात तक अगर स्वास्थ्य में फर्क नहीं पड़ता तो सीधा एम्बुलेंस में कार्डियक डॉक्टर को साथ ले कर मुम्बई लाना!
आबा के 85 साल के बाबा आज भी खुद का काम खुद करते थे! उनके माता-पिता के होते न तो उन्हें कभी प्रतिभा जी की चिंता होती थी न कारोबार की! प्रतिभा जी का पीहर नजदीक के गाँव में ही था! उनका पीहर का नाम प्रमिला था! एक आवाज़ देते ही, एक फ़ोन कॉल के जाते ही सभी मदद को दौड़ कर चले आते!
संघर्ष आबा के जीवन का अब अटूट हिस्सा बन चूका था मानों किसी चित्र को रेखांकित करने के लिए उभारी गई काली रेखाएं! एक मुसीबत से पीछा छूटा नहीं कि दूसरी मानों इंतज़ार में खड़ी ही मिलेगी! आबा को तो मानों अब आदत सी हो चुकी थी! उन्हें अचरज तो तब होता जब जीवन की गाड़ी पटरी पर 'नॉन स्टॉप' आगे बढ़ रही हो...
प्रतिभा जी बाहर से जरूर श्रीफल सी कड़क लगती थी लेकिन अंदर से बहुत कोमल, मीठे प्रेम-जल से भरी थी! कठिन वक़्त का मुकाबला तो वह हिम्मत से कर लेती थी मगर वक़्त गुजर जाने के बाद अगर किसी अपने ने सहज़ भी अगर पूछा कि क्या हुआ था तो वह उस पल को याद कर अपने आप को आंसुओं से भीगो देती!
आबा की चिंता बढ़ेगी यह सोच कर उसने खुद भी फ़ोन पर कुछ नहीं कहा था और सब को वहीं आदेश दिया था ! अतुलनीय, अनूठा प्यार था आबा और प्रमिला जी का! दोनों के बिच फासलें बहुत थे पर मन जुड़े-जुड़े! बिन कहें, बिन बोले ही समझ जाते थे एक-दूजे के अंतर्मन को!
फाटक खोल कर वज्र को आते देख सभी संभल गए! आबा ने छोटू को चुप रहने का इशारा किया और अख़बार चेहरे के सामने रख दिया ताकि वज्र कुछ न पूछे!
वज्र भी उनका ही तो बेटा था! उसके अंदर आने तक आबा की कोई प्रतिक्रिया नहीं! क्या बात हैं? उसने आबा को आवाज़ लगाई, " आबा! जेवलात का? " आबा ने हौले से अख़बार सामने से हटाया और बोल पड़े.. "जा! हाथ-पाय धुऊन ये ...बरोबरचं जेऊ या!"
आबा जानते थे.. वज्र बाबा को बहुत प्यार करता हैं! उनके ही कंधों पर चढ़ कर उसने गाँव ही नहीं सारी दुनिया देखी थी और बाबा के लिए भी वह 'सोने की मेख' था! बाबा ICU में हैं यह सुनेगा तो पता नहीं कैसे प्रतिक्रिया देगा! अति उत्तेजना उसके लिए यमराज की आहट थी! कैसे यह जोखिम उठा सकते थे आबा? उनके आई-बाबा के लिए भी तो 'दूध की मलाई' था वह!
आबा ने खुद पर नियंत्रण रक्खा और वज्र को भनक तक नहीं लगने दी कि उसके दादा जी ICU में हैं...उन्होंने शान्ति से भोजन किया.. अन्नपूर्णा ने बनाएं हुए लड्डू बहुत ही स्वादिष्ट बने थे.. आबा ने वज्र को लड्डू खिलाया, लड्डू से भरा डिब्बा वैदेही के यहाँ ले जाने को कहा और आराम करने के बहाने अपने कमरे में चले गए... वज्र भी जल्दी-जल्दी भोजन समाप्त कर अपने कमरे में चला गया!
आज शाम पांच बजे धमाचौकड़ी मचाने सब वैदेही के यहाँ इकठ्ठा होने वाले थे! विभा की धारदार कलम ने नाटक को बहुत ही प्रभावी तरीके से लिखा था! संवादों में पूरी जान भर दीं थी उसने और नाटक से आ रहा सन्देश भी सीधा दिल तक पहुँच रहा था! वज्र, वैदेही और यश बहुत खुश थे उस स्क्रिप्ट से!
पांच बजने को सिर्फ पांच मिनिट कम थे तभी तीनों वैदेही के यहाँ पहुँच गएँ थे! वज्र ने सब से पहले लड्डू का डिब्बा वैदेही के हाथ में दिया! वैदेही ने सब को एक-एक लड्डू थमा दिया! वैदेही ने सभी के लिए नारियल पानी बना कर रक्खा था.. सभी ने उसका मज़ा लिया और लग गए सब के सब अपने काम पर...
विभा ने गणपति बाप्पा को नमन किया और शुरू हो गई! तभी यश बोल पड़ा, "रुक यार डेक्कन क्वीन... पेपर-पेन तो निकालने दे.. फिर बोल बोल्ड & ब्यूटीफुल "
तभी विभा बोल पड़ी, " उत्तरपत्रिका में जवाब नहीं लिखने हैं.. संवाद बोलने हैं बुद्धू!" दोनों का संभाषण चल ही रहा था कि वज्र बोल पड़ा, " कभी तो कूल हो कर सोचो न यार! हम एक सीरियस मुद्दे पर नाटक कर रहें हैं! तभी यश बोल पड़ा, " सीरियस? यार वज्र! मुद्दा सीरियस हो या लाइट... नाटक में हँसी-मज़ाक नहीं होगा तो कौन सुनेगा हमारे संवाद? यार! सब एन्जॉय करने आयेंगे, दिमाग का दही करने नहीं! सभी हँस पड़े!
आखिर यहीं तो कला हैं.. हँसते-हँसते गहरी बात को कहना, चलते-चलते जीवन का असली अर्थ समझाना...
नेत्रदान-अंगदान विषय भले ही गंभीर था लेकिन सरल शब्दों को हास्य रस में घोल कर प्रस्तुत करना तथा महत्वपूर्ण सन्देश को घर- घर तक पहुँचाना ही तो लक्ष्य था इस मंडली का! जन-जागृति का लक्ष्य मनोरंजन का तड़का लगा कर और हास्य-शैली अपना कर ही हासिल हो सकता था!
विभा ने फलक पर अपनी मेघा से एक चित्र ऊकेर दिया था.. अब वज्र, यश और वैदेही को भी अपनी-अपनी कुची से उसमें अपनी पसंद के रंग भरने थे...चित्र पर कहीं उजाले तो कहीं अँधेरे का प्रभाव दर्ज करना था! उम्मीदों के बादल नीले आसमान में उमड़ आएं थे अपनी शुभ्र, धवल छटा लिएं...
विश्वास था उन्हें अपने नेक इरादों पर,भागीरथ कोशिशों पर और अपनी अटूट ज़िद-जीवट पर..
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र
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