शीर्षक : मुखौटे....
कुछ लोग झूठ भी ऐसे बोलते हैं मानों मूंगफली-चना, ब्रेड-बटर खा रहे हो! चलते-फिरते, उठते-बैठते जुमलेबाजी, बड़ी-बड़ी बातें, जिसका न कहीं कोई सिर-पैर! मकसद एक ही, महफ़िल में लोगों की नज़र में चढ़ ज़ाना! कड़वा है मगर यही सच है! पानी कहेंगे, वहाँ कीचड़ भी नहीं मिलेगा! बातें ऐसे करेंगें मानों फूल झर रहे हो! हकीकत को परखेंगे तो दूर-दूर तक कोई ठौर-ठिकाना नहीं मिलेगा! क्षेत्र कोई भी हो, तरीका यही! बोली में गज़ब की मिठास मानों दूध में घुली मिश्री! व्यवहार ऐसा मानों शराफत की जन्मघुट्टी इन्हें पैदा होते ही पीला दी गई हो! मार्केटिंग के हुनर में अव्वल!
कड़वा सच यहीं है कि इनके चेहरे पे मुखौटे लगे होते हैं! कब बातों-बातों में आपको जिन्न सा बोतल में उतार देंगे, पता ही नहीं चलेगा! कब साथ आ कर जन्म-जन्म का रिश्ता निभाने का वादा करेंगें और कब आप को गहरी खाई में धकेल पतली गली से चम्पत हो जायेंगे, पता ही नहीं चलेगा! क्यारम के खेल सा कब, कहाँ स्ट्राइक करेंगें, असली निशाना कहाँ होगा, आपको पता ही नहीं चलेगा! कड़वा सच है जी मगर सच है जी! सावधान!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा |