पराकाष्ठा हैं जड़ता की... पराकाष्ठा है जड़ता की...
स्व-केंद्रित मानसिकता की।

बिच राह में कराहती नारी,
दर्द, पीड़ा की खाई है भारी।
दर्शक है सभी भीड़ तमाशाई,
स्वयं से नहीं व्यवस्था से हारी।

पराकाष्ठा है जड़ता की...
अनदेखा कर अन्याय, जीने की! 

'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ'
किस-किस से बचाएं बेटी को?
अंदर-बाहर छुपे दरिंदो से?
गिद्ध से खूंखार शिकारी से?

पराकाष्ठा है जड़ता की...
चीरहरण का हलाहल पीने की!

विद्या के मंदिर बने हैं,
आत्महत्या के केंद्र नए!
तनाव, अवसाद के मारे,
सौदागरों के हैं वारे-न्यारे!

पराकाष्ठा है जड़ता की...
मुक्कों को सह मौन रहने की!

भ्रष्टाचार-दीमक से खोखली,
जर्ज़र कानून, न्याय व्यवस्था।
न्याय बिक रहा हाट-हाट पर,
श्रमिक, कृषक जी रहा पेट काट कर।

पराकाष्ठा है जड़ता की...
शोषण को शिष्टाचार बनाने की!

अंधे नेता, मुक-बधिर जनता,
जनप्रतिनिधि 'क़ानून नहीं मानता'!
संसद, विधायिका, कुश्ती का मैट,
सवाल नहीं, करें मोबाइल पे चैट।

पराकाष्ठा है जड़ता की...
हमवतन जतन की नहीं अध:पतन की।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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