विधा: दोहा छंद।
चल री बहना भंवरी, भरे कूप से नीर।
घास-फूस की झोपड़ी, आँगन काग अधीर।।
प्यासी गौ-माँ-श्वान भी , बुझा-बुझा सा ताप।
कट-कट करते दाँत हैं, जीवन लगता शाप।।
गड्डे खाली पेट के, नयन बहे हैं पीड़।
भरी राब से तश्तरी, सुनी लगे है नीड़।।
पहुड़ी धरती चैन से, ऊपर नीला व्योम।
फल्ली सहज़न की करे, नर्तन बोले ओम।।
जब अभाव मन में नहीं, मुख पर अतिशय तेज।
सुखमय लागे गोधड़ी, मिट्टी की हो सेज।।
निर्मल मन तन धूल हो, नैना पावन धाम।
अधजल गगरी लूरके, भरी हृदय ले थाम।।
स्वरचित व मौलिक,
स्वयंसिद्धा, मुम्बई।