भ्रष्टाचार!

 

शीर्षक : भ्रष्टाचार!

मुखौटों की भीड़ में अपनों की पहचान मुश्किल हैं!
गद्दारों, जयचंदों के ग्रहण से राष्ट्र-सूर्य धूमिल हैं!
मेहमान-यजमान बने गर दुश्मन, संज्ञान मुश्किल हैं!
भ्रष्टाचार की दीमक से राष्ट्र-निर्माण मुश्किल हैं!
छुपे भेड़िये सुशोभित करें लोकतंत्र-मन्दिर-सीढ़ी!
दशाननों को नैतिकता पढ़ाना टेढ़ी खीर बड़ी!
भू-तेल-बालू माफिया रोके कर्मयोगी की राह-गली!
असहाय आम आदमी, कैसे बचेगी वीरों की जन्मस्थली?
जन-गण-मन की पीड़ कौन सुनेगा प्रजातंत्र में?
कैसे गूंजेगा शंखनाद शहीदों के स्मारक-स्थलों में?
कँटिली झाड़ियों में सदाफूली की मुस्कान मुश्किल हैं!
बंजर धरा पर कलकल बहता झरना मृगजल है!
भ्रष्टाचार बनाम शिष्टाचार, नौकरशाही का गहना!
कौन देखेगा किसने बसंती चोला है पहना?
सिक्कों की खनक सुनने के आदि हो जब कान,
कैसे मिलेगा बुजुर्गों-महिलाओं को अग्रिम पंक्ति में स्थान?
विदेशी माल-लोकाचार-विचार, स्वदेशी पर गर्व मुश्किल हैं !
भाईचारे-सह्रदयता बिना राष्ट्र-निर्माण मुश्किल हैं!
भ्रष्टाचार घुला जब रक्त-धमनियों में, स्व-सम्मान मुश्किल है!
अध:पतन राष्ट्र-भक्ति, नीति-मूल्यों में, स्वाभिमान मुश्किल है!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |

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