परिंदा हूँ मैं.....

शीर्षक: परिंदा हूँ मै ...

परिंदा हूँ मैं...

मैं क्या जानु मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, स्थानक में फर्क ?

सृष्टी के रच्चनहारे की अर्चना, अजान, अरदास, आगम के तर्क!

परिंदा हूँ मैं...

शांतिदूत मैं, पंखों में है गज़ब का बल, उड़ान भरता मैं नित्य हर पल!

कैसे जानू मैं मानव निर्मित आशियाने, अट्टालिकाओं का हाल?

कैसे अनदेखा करूँ गन्दी बस्तियों में पलते, बूंद-बूंद को तरसते भूखे-नंगे नौनिहाल!

परिंदा हूँ मैं...

मेरे लिए हैं नीला आकाश, हरे-भरे खेत-खलिहान, कल-कल बहते झरने, चंचल पवन!

मैं क्या जानु देश, प्रान्त, कबिलों की सीमा रेखाओं से बँटा-छटा गगन?

कैसे दूर करु मैं मानवता के तेजोमय सूर्य पर लगा ग्रहण?

कैसे मौन देखता रहूँ मैं दरिंदों की बेशर्मी का बेखौफ़ चलन?

परिंदा हूँ मैं .... 

स्वच्छन्द व्योम का अभिलाषी, तिनका-तिनका जोड़ बनायें नीड़ का वासी! 

छोटी-छोटी आशाओं के झूले पर झूलता, नन्हो को दाना चूगाता मैं प्रवासी!

अपनी बुद्धिमानी पर इतराते मानव! किसी भ्रम में नहीं जी रहा हूँ मैं, 

हर पल खून के घूंट पी रहा हूँ मैं!

मुमकिन है …कहीं दूर पहाड़ी के पीछे,

ज़ालिम घात लगा बैठे हो,

मानवता को ठेंगा दिखा पर काटने पे आमादा हो , 

इंसानियत के दुश्मन, धार्मिक कट्टरता के सनकी, गन लिए खड़े हो … 

महकती फिजा में प्रेम की नमीं नहीं, नफ़रत का जहर घुला हो,

मुमकिन है …

कल लौट न पाऊ मैं आम्रवृक्ष पर झूलते घरौंदे में !

तिनका-तिनका जोड़ बुने आशियाने में ....

ताज्जुब नहीं .... 

कोई धर्मांध बम से मेरे चिथड़े उडा दे ....

कोई सिरफिरा …जेहाद के नाम पर ....

मुझे लहूलुहान कर दे … 

परिंदा हूँ मैं ...

कैसे रोक दूँ मैं ...

आसमानी आकाश में बाज़ सी ऊँची उड़ान ?

कैसे रोक दूँ मैं .... 

शांति के लिए सात-समंदर पार प्रस्थान?

कैसे त्याग दूँ मैं ...

जिद्द, जीवट, जद्दोजहद, जंग बिना अपने प्राण?

 

स्वरचित तथा मौलिक,

द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई, महाराष्ट्र।

 

 

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