जननी जन्मभूमि

आर-पार कर पृथ्वी की कक्षा, अन्तरिक्ष को छूं लूँ 

माँ भारती का परचम लहराऊँ, अमृत रस पी लूँ।।


साहस के कंधों पर चढ़, ब्रह्माण्ड-रहस्य खोज़ लूँ।

सागर की गहराइयों में डूब, चुनौतियों को पेलूँ।।


बड़े-बड़े ख़्वाबों के बलबूते, सफलता को हर लूँ।

प्रयास-सोपान चढ़, माँ भारती का रूप निहारूँ।।

 

हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई-बुद्ध-जैन सब जान।

धर्म-सहिष्णुता, अनेकता में एकता राष्ट्र पहचान।।

 

सबका साथ, विकास, कर्तव्य बना देश महान।

माँ भारती पद पंकज पर अर्पित मम हृदय-प्राण।।


जय जवान-किसान, जय विज्ञान-अनुसंधान।

आत्मनिर्भर भारत का मंत्र, सफलता प्रतिमान।।

 

विश्व गुरु बन ज्ञान से रोशन करुं सारा संसार।

शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, तकनीक युवा-पहचान।।

 

वेद, उपनिषद, कुराण, आगम, गुरुवाणी आधार।

योग-आयुर्वेद-खगोल-सांख्यिकी राष्ट्र सरदार।।

 

हर दहलीज पर सजे ज्ञान दीप, द्वार वन्दनवार।

नौनिहाल के कन्धों पर हो मयूरपंखी सपन-भार।।


शुद्ध जल, पोषक अन्न, सुंदर घर, जन-अधिकार।

देश हित मर-मिटने आतुर, जाँबाज़-जीवन-सार।।


उतारूँ आरती, माँ भारती, वारी जाऊँ वारंवार।

रत्नगर्भा जन्मभूमि! पूजन कर वंदू सौ सौ बार।।


स्वरचित मौलिक रचना

कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई।

 

इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर कहानी! आगे जे वहाग का इंतज़ार रहेगा!🙏❤️🙏❤️🙏❤️🙏
  • बिल्कुल दिल को छू लेने वाली रचना