ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग १९
भाग १९

विभा का चेहरा जलने से हुएं घाँव सूख चुके थे और फफोलों के निशान प्लास्टिक सर्जरी से पूरी तरह ढँक चुके थे... जलने से डरावना, विद्रुप बना चेहरा अब बदल जरूर गया था लेकिन घिनौना बिल्कुल नहीं था! विभा ने उस जले हुए चेहरे की छवि को भी मोबाइल में कैद कर लिया था ताकि वो अपने करीबी सखा-सहेली को बता सकें कि वह किस दौर से गुजरी है...लेकिन अति संवेदनशील वज्र के बारे में सोच कर वह खामोश रही! दर्द जब तक मन ही मन में उबलता रहता हैं तब तक बहुत पीड़ा देता हैं मगर जब उसे अपनों में बाँट दिया जाता हैं तो उसका दाह कुछ कम महसूस होता है! विभा वक़्त के थपेड़ों को अकेली ही सह-सह कर वज्र सी कठोर बन गई थी... यह उसका स्वयंसिद्धा बनने का जुनून ही था जो बार-बार परीक्षा देता रहा और अंत में कामयाबी के शिखर तक पहुँच ही गया! 
विभा कब से यश को फ़ोन लगा रही थी पर यश था कि फ़ोन ही नहीं उठा रहा था.. सिर्फ रिंगटोन बज रही थी,  "आएं हो मेरी ज़िन्दगी में.. तुम बहार बन कर..."
विभा थक कर विश्राम करने चली गई! उसकी मदद के लिए माँ अपने घर की पुरानी आया की लड़की लाली को यहाँ मुम्बई उसके पास छोड़ कर चली गई थी! वह उसका हाथ बंटाती.. उसे खाना, चाय-पानी बना कर देती! 
विभा ने लाली को तेज अदरक-मसाले वाली चाय बनाने को कहा और फिर एक बार उसने यश का नंबर लगाया! सामने से रिंगटोन के ख़त्म होते ही यश की आवाज़ सुनाई दीं," अरे ! चैन से नहाने भी नहीं देती... जनम-जनम का पाप धो रहा था मैं...अब बोलेगी या ऐसे ही ... तभी सामने से आवाज़ आई... "यह भी क्या नहाने का टाइम हैं? बाथरूम में BMC के पानी से नहाने से पाप नहीं धुलते! चल! गंगा में डूबकी लगा आते हैं... " दोनों खिलखिला कर हँसने लगे..
विभा ने कहा, " मैं 'ओला' बुक कर आऊंगी... तैयार रहना..चार बजे तुम्हें पिक करुँगी... फिर आगे जायेंगे!

यश ने हाँ कह कर फ़ोन रख दिया और आगे की तैयारी में जुट गया! छोटे-छोटे कामों के लिए उसे अधेड़ उम्र के भाईसा की मदद लेनी पडती थी.. जयपुर से ही पिताजी ने उसे यश के साथ रक्खा था उसका रात-दिन खयाल रखने के लिए! 
यह वह दौर था जब पीढ़ियाँ खप जाती थी एक ही घर में काम करते-करते! अनजाने में ही वो हवेली के सुख-दुःख से जुड़ जाते थे! न आज जैसा बंदरों की उछल-कुद सा माहौल था न कामकाजी दुनिया में परायेपन का एहसास!
'जयपुर फुट' ने यश को राहत जरूर दीं थी लेकिन अभी भी उसके शरीर ने उसे पूरी तरह अपनाया नहीं था! रच्चनहारे ने कितनी रचनात्मकता तथा दूरदृष्टी से काया को ढाला हैं न! आसानी से नई चीज को शरीर स्वीकार नहीं करता हैं.. किसी न किसी रूप से वह अपनी नाराजगी जगजाहिर करता ही है! यश को भी वक़्त लग रहा था उसके 'जयपुर फुट' के साथ तालमेल बैठाने में.. यह उसकी जीवट और जद्दोजहद ही थी कि नित नएँ घाँवों की पीड़ा को सह कर वह जीवन पथ पर अग्रेसर हो रहा था.. नई मंजिल को सर करने की धुन लिए!
दोपहर में वैदेही की आँख लग गई और वह सपनों की दुनिया में खो गई! 
विनय की याद उसे बार-बार झकझोर रही थी... "यार! वैदेही.. इतनी जल्दी भूल गई मुझे? अब तेरा हाथ पकड़ कर नाचेगा कौन?" अवचेतन मन के सवाल ने वैदेही की नींद उड़ा दीं और वह हड़बड़ाकर उठ बैठी! 
साढ़े तीन बज चुके थे.. माँ तो पहले ही चाय बना चुकी थी और उसका इंतज़ार ही कर रही थी! उसने चाय के साथ दो खारी पूड़ी खाई और झटपट तैयार होने कमरे की ऒर चली गई! जानकी, उसकी माँ उसे निहारती रह गई! मन ही मन बोल पड़ी... बच्चों की ज़िद को सलाम करने का दिल करता हैं.. किसी ने भी डर कर हथियार नहीं डाले... सब सीना तान खड़े हैं विपत्ति के सामने!
वैदेही समय पर वज्र के यहाँ पहुंच चुकी थी.. उसे देखते ही वज्र की आँखें मोतियों सी चमक गई... तभी फाटक पर विभा और यश 'ओला' से उतरते हुएं दिखाई दिएँ...
समय के मामले में सभी बहुत ही पाबंद थे.. वो जानते थे सफलता की चाबी समय अपने कमरबंद से निकाल कर उन्हीं को देता है जो समय की कीमत करना जानते हैं!
सभी आबा का चरणस्पर्श कर वज्र के साथ उसके कमरे की ऒर चल पड़े! आज ही सासवड से अंगूरों की पेटियाँ आई थी... छोटू सबके लिए अंगूर का ज्यूस लेकर आया और सभी नाटक किस विषय पर हो...इसकी चर्चा में व्यस्त हो गएँ! 
कुछ ही समय पहले ज़िन्दगी ने उनका इम्तिहान लेकर उन्हें उनकी औकात दिखा दी थी! किताबों के पन्नों के बिच छुपे-छुपाये फूलों सा ज्ञान और ज़िन्दगी की खुरदरी जमीन पर बिखरे शूलों के यथार्थ का फर्क वो समझ गए थे! वो इसी पशोपेश में थे कि क्या वास्तविकता का धुंधला दर्पण विद्यार्थियों, अभिभावकों, आम लोगों को दिखाएँ या चिकनी-चुपड़ी फूली हुई रोटी सी कोमल ज़िन्दगी को सच्चाई का दर्पण कह कर लोगों को क्षणिक सुख, उल्हास का भागीदार बनाएं! विषय कौन से हो? रोजमर्रा की ज़िन्दगी के फलक को कोहरे से ढंकते विषय या चेतना को झकझोर कर जागृत करते विषय! 
रसोईघर की दीवारों को लाँघ कर आती बासमती चावल की खुशबू सबको दीवाना कर रही थी! पेट में दौड़ते चूहें भी एकाएक और ज्यादा शैतानी कर रहें थे! जबरदस्त विचार-विमर्श के बाद यह तय हुआ कि इस बार का विषय नेत्रदान और अंगदान होगा और विषय विस्तार और प्रस्तुति 'यश स्टाइल' में ताकि बात भी पहुंचे और सुनने वाले सन्देश को हाथों-हाथ लें...
विभा हिन्दी में ही बैचलर ऑफ़ आर्ट्स की डिग्री ले रही थी तो हमेशा की तरह नाटक को लिखने, उसके संवाद को प्रभावी बना कर प्रस्तुत करने का जिम्मा उसे ही दे दिया गया था!
विभा ने दो दिन में नाटक लिखने का वादा किया और प्रैक्टिस के लिए हर एक के घर पर हफ्ते के दो दिन जाने का निश्चित हुआ! विभा के यहाँ एक दिन तय हुआ!
बच्चों की कोशिशों को देख आबा बहुत आनंदित थे! बच्चों की खुद्दारी ने उन्हें अपनी जवानी याद दिलाई! वो भी तो तमाम अवरोधों के बावजूद सब से आँख से आँख मिला कर बात करते थे! बात स्वाभिमान की आती तो हर किसी के आगे वो सीना तान कर खड़े हो जाते...यह उनकी खुद्दारी का ही परिणाम था कि आबा आज सफलता की चोटी पर खड़े नज़र आ रहें हैं..
बच्चों ने वेजिटेबल बिरयानी और कोशिम्बिर का लुत्फ़ उठाया और अन्नपूर्णा की दिल खोल कर प्रशंशा की..
सभी आबा को प्रणाम कर निकलने ही वाले थी कि आबा के फ़ोन कि घंटी बजी... दो मिनट के लिए सभी खामोश खड़े हो गए.. आबा फ़ोन पर बात करते-करते बहुत खुश नज़र आ रहें थे... सभी के चेहरे पर प्रश्नचिन्ह  उभर आएं थे तभी आबा फ़ोन रख कर बोल पड़े... पोरा नों! 'इंडो- नेपाल सांस्कृतिक मंच' के सेक्रेटरी का फ़ोन था! उन्होंने विनय के पापा और विनय की माताजी का बहुमान करने का निर्णय लिया हैं! वार्षिक उत्सव में विशेष सम्मा ननीय अतिथियों के समक्ष उनका बहुमान किया जायेगा! 
सभी उछल पड़े! वो जानते थे यह निर्णय मतलब दोनों हाथों में लड्डू! विनय के माता-पिता से मुलाक़ात भी होगी और उनकी दरयादिली का सम्मान भी होगा... दो देशों के बिच इससे सुन्दर रिश्ता क्या हो सकता हैं ?

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र|
अगला भाग अगले अंक में...


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