एक शाम लिख दूं मैं बूढ़े माता-पिता के नाम! जो जीवन की सांझ-बेला में भी, बरगद के पेड की विशाल जटाओं को फैला, धरती की ओर रुख कर व्यस्त रहते थे अपनी नहीं बल्कि अपने जवां बच्चों की ही चिंता में!
बढ़ती उम्र के साथ-साथ कई बीमारियों से भी उनका जनम-जनम का नाता जुड़ चूका था! जीवन की 'विंटेज कार' कभी दवाइयों के बलबूते तो कभी 'जोर लगा के हैय्या' के सहारे आगे बढ़ रही थी!
न जाने क्यों उनके मन में सदा आशंका रहती कि कब यमराज की वक्रदृष्टि उन पर पड जाएं और कब इस मायावी संसार को अलविदा कह कर सब कुछ छोड़ कर उन्हें भी जाना पडे! ऐसे में अपने बच्चों की, बेटे-बेटियों की याद तो आएगी ही न!
हंसता-खेलता संयुक्त परिवार...भाई-भाभी पोते-पोतियां! सभी दादा-दादी की सार-संभाल करते, समय पर खाना-पीना, मान-सम्मान देते! फिर भी बेटी-जमाई को मिलने का मन होता तो किसी न किसी बहाने बुला ही लेते!
क्या विडंबना है न! जो माता-पिता हमारे लिए अपने सपने, अपने दु:ख-दर्द, अपनी ख्वाहिशें, अपने जज्बात भूल कर सिर्फ हमारे ही भविष्य को संवारने की चिंता में लगे रहते हैं, उनके लिए बुढ़ापे में हमारे पास वक़्त नहीं होता! आधुनिकता की आड़ में हमें पुराने रिवाजों से जुड़े माता पिता "ऑटडेटेड" लगने लगते हैं! चाहते क्या है वो हमसे? जरा सा सम्मान! सुख- दु:ख को सांझा करने के लिए, मन के बोझ को हल्का करने के लिए जरासा वक्त! वहीं तो नहीं है हमारे पास अपनी तरक्की, अपने दोस्त, अपने सपनों को साकार करने में हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हम, हमारे भविष्य की नींव तले दबे हमारे बुजुर्गों के अरमानों को रोशनी की अदना सी किरण से भी मरहूम कर देते हैं!
शायद इसीलिए हमारे पूर्वजों ने तीज-त्योहार, गणपति, राखी का आयोजन उस घर में करने का विधान किया था जहां बड़े-बूढ़े हो, घर के बुजुर्ग हो, माता-पिता हो!
एक शाम लिख दूं मैं बूढ़े माता-पिता के नाम! ताकि उनकी वेदना को समझ सकूं! उन्हें कम-से-कम दो मीठे बोल बोल कर राहत दे सकूं! उनके आंखों की नमी को मुलायम उंगलियों से पोंछ सकूं...उनकी आंखों की पुतलियों में झांक कर उनमें उभरती अपनी तस्वीर देख सकूं! उनका बुढ़ापा सहनीय बना सकूं!