यें प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ६३
भाग ६३

प्रकृति के तेवर भी बडे अजीब होते है! घड़ी में धूप, घड़ी में छाँव! कभी सुवर्ण रश्मियों से जगमगता जहाँ तो अगले ही पल आसमान में छाया घना कोहरा, बादलों का शोरगुल और ओलों की बरसात! कभी शांत बहती, खिलखिलाती नदियाँ की धारा तो कभी अचानक रौद्र  रूप धारण कर विनाशलीला दिखाती प्रलयंकारी जलधारा! कभी हिमाच्छादित पर्वत माला तो कभी पिघल कर पहाड़ी से छलांग लगाता, जीवन लीलता प्रपात! 

वज्र का जीवन भी इन्हीं अनहोनियों से भरा पड़ा था। जरासी सुख की सुनहरी धूप के दर्शन हुए नहीं कि मानों नियति को भी इर्षा होने लगती थी! वज्र के मन में न जानें क्यों विचारों का कोलाहल था जो किसी अनहोनी के संकेत दे रहे थे। तभी आबा का फ़ोन आया। उन्होंने रोते-रोते वज्र को कहा, " बाबा आम्हाला सोडून गेले रे पोरा...तू संभाळ रे सगळ्यांना!" वज्र के पैरों तले से मानों धरती खिसक गई थी। वो कुछ संभले उसके पहले ही वैदेही वहाँ पहुँच गई थी। छोटू ने कमरे की तरफ इशारा किया! वैदेही सीधी वज्र के कमरे में पहुँच गई। वज्र को मानों उसी का ही इंतज़ार था। उसे देखते ही वह रोते-रोते उससे लिपट गया। वैदेही की आँखों से भी अश्रुधारा बह रही थी। उसने वज्र को बाहों का सहारा दिया और छोटू को पानी लाने भेजा।

" वज्र! उन्होंने अपनी ज़िन्दगी ख़ुशी-ख़ुशी जी ली! हमेशा परोपकार में लीन रहे। तुम चाहते हो न उन्हें परमात्मा के चरणों में जगह मिले? तो यह रोना-धोना बन्द करो और उनकी आत्मा की शान्ति के लिए गायत्री मन्त्र बोलो! वज्र! प्लीज खुद को सम्भालो और आबा को सहारा दो।" वैदेही उसे समझा रही थी। दिल पर ज्यादा बोझ पड़ना वज्र के लिए नुकसानदेह था। 

कुछ समय  बाद जानकी जी भी वहाँ पहुंच गई। आबा ने उन्हें आज वज्र के पास ही रुकने को कहा था। वैदेही ने विभा और यश को भी यह ख़बर दे दी थी। आधे घण्टे में वो भी वज्र के घर पहुँचने वाले थे। वज्र को रह रह कर आजोबा की याद आ रही थी। वह उनके लिए 'नवसाचं पोर' था। वज्र और वैदेही उन्ही की गोद में खेलकूद कर बढ़े हुएं थे।उनके होते हुए किसी की हिम्मत नहीं थी वज्र को डांटने-दपटने की। वज्र उनके लिए 'सोने की मेख' था।
मानों उनकी ही प्रतिकृति। उन्हीं के जैसा हमेशा दूसरों की मदद को तैयार, मृदुभाषी और तेज-तर्रार! आजोबा की जान वज्र में ही बसती थी। वज्र उनकी उम्मीदों का पुलिन्दा था। यह राहत की बात थी कि वो वज्र को हँसता- खेलता देख कर गए। वज्र यादों में इतना खोया था कि दरवाजे के घंटी की आवाज़ उसे सुनाई भी नहीं दी। विभा और यश आ गएं थे। जानकी जी ने सबके लिए खाना बनवा लिया था। यश और विभा भी वज्र के गले मिले और उसे सांत्वना दी। 

जानकी जी ने सबको फ्रूट ज्यूस पीने को दिया। वज्र ने ना-नुकर किया लेकिन जानकी जी ने जबरदस्ती उसे ज्यूस पिलाया। ऐसे ही आबा ने उन्हें यह जिम्मेदारी नहीं सौंपी थी। जानकी जी में वह समझदारी तथा दूसरे को अपनी बात मनवाने की कला भी थी जिस में वह माहिर थी। वज्र का ध्यान रखना यह उनका प्रथम कर्तव्य था और वह उसे पूरी शिद्दत से निभा रही थी। 

जानकी जी ने आबा से फ़ोन पर बात की और आबा के सामने सासवड़ आने की बात कहीं। आबा ने उन्हें आगे की सभी विधि-विधान के बारे में रात को फ़ोन कर बताने का वादा किया और फ़ोन कट कर दिया।

जानकी जी ने सभी बच्चों को खाने के लिए बुलाया। वज्र को समझा-बुझा कर खाने के लिए बैठाया। खाने में सहजन के पत्तों की सब्जी, ज्वारी की भाकरी और लहसुन की चटनी थी। थोड़ी कोशिम्बिर भी जानकी जी ने बनवाई थी। सहजन की सब्जी देख वज्र की आँखें फिर भर आई। आजोबा की यह पसंदीदा सब्जी थी और उन्होंने ही यह सब्जी खाना वज्र को सिखाया था। वैदेही ने उसके कन्धे पर हाथ रख उसे सांत्वना दी। यश बोल पड़ा, " वज्र! हम भी आते हैं तुम्हारे गाँव! चलो! अब खाना खा लो जल्दी-जल्दी। अरे यार! तुम्हारा पुराना अल्बम हैं न? चलो! देखते हैं उसे!" यश ने विषय को दूसरी ऒर मोड़ने की कोशिश की। विभा आज खामोश थी। उसने वज्र को पहली बार इतना उदास देखा था।
जानकी जी ने भी खाना खाया और अन्नपूर्णा और छोटू को भी खा कर सब समेटने के लिए कहा। 

वैदेही ने यश और विभा को वज्र के पेंटिंग के बारे में बताया। अब विभा वज्र के पीछे पड़ गई। सभी वज्र के कमरे में गए। वज्र के कमरे में स्टैंड पर पेंटिंग लगी हुई थी। जैसे ही विभा ने पेंटिंग का आवरण निकाला, दोनों भौचक्के रह गएं। इतना सुन्दर पेंटिंग। विभा तो दो-तीन  मिनिट देखती ही रह गई। वज्र ने पेंटिंग में वाटर कलर से जान डाल दी थी। दोनों पूछ बैठे, " वज्र! किसकी हैं यह पेंटिंग? कौन हैं यह सुन्दर सलोनी बच्ची और यह गोरा-चिट्टा लड़का? सभी हँसने लगे। इस बार यश का नुस्खा चल गया। वज्र ने अपना बचपन का फोटो दिखाया और कहा, "विभा! पहचान कौन? "
अब विभा उस फोटो को बार- बार देख कर पहचानने की कोशिश करने लगी। तभी उसकी दिमाग़ की बत्ती जल उठी! कहीं यह वज्र तो नहीं?  उसने फिर फोटो और पेंटिंग को ध्यान से देखा। उसी समय यश बोल पड़ा, "आज मेरी 'झाँसी की रानी' ने सही पहचाना तो मेरी तरफ से आईक्रीम की पार्टी! यश चैलेन्ज दे और विभा पीछे हट जाएं, नामुमकिन था! वह और गौर से चित्र और फोटो को देखने लगी.. कुछ ही समय बाद वह चिल्लाई मानों आर्कीमीडिज को टब में स्नान करते-करते घनत्व का  फार्मूला मिल गया हो! 

"यह तो वज्र और वैदेही हैं। देख इनकी आँखें, नाक-नक्श!" वज्र सही हैं न। वज्र हँस पड़ा। यश और विभा की नौटंकी काम कर गई। वज्र बोल पड़ा, "यश! तू गया काम से! अब यह 'ब्यूटी क्वीन' तुम से आईसक्रीम लिए बगैर छोड़ेगी नहीं तुम्हें। मन ही मन में विभा कह रही हैं,"अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे!" 

वज्र को सहजता की ऒर लौटते देख वैदेही भी खुश हो गई। वज्र की हल्की सी मुस्कुराहट वातावरण में ताजगी ला चुकी थी। 

विभा बोल पड़ी, " वज्र! इतनी सुन्दर पेंटिंग्स बनाते हो, कभी बताया भी नहीं दोस्तों को! अब और चित्र बनाना.. फिर प्रदर्शनी लगाएंगे हम तेरे पेंटिंग्स की! " 

वज्र के चेहरे पर धीमी मुस्कान थी। न जाने क्यों, हर बात उसे आजोबा की ऒर ही ले जा रही थी। आजोबा उसके इतने करीब थे कि कोई बात वज्र उनसे कभी छुपा ही नहीं पाया कभी। रह-रह कर वह पुरानी यादों को समेट कर पिंजरे में बन्द कर रखने की कोशिश करता और यादें थी कि पिंजरा बन्द होने से पहले ही आजाद हो चुकी गौरय्या सी दूर उड़ जाती। आजोबा उसकी धमनियों में बहते खून के कतरे-कतरे में शामिल थे। उनका इस तरह चिरप्रयाण को निकल जाना उसके लिए अपूरणीय क्षति थी! उनके अंतिम दर्शन न कर पाने का गम भी उसके दिल में शूल बन कर चुभ रहा था। लेकिन विधि के विधान के आगे वह कर भी क्या सकता था?

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में...


इस पर लोग क्या कह रहे हैं