आओ! जी ले जरा..
आओ! जी ले जरा! जिंदगी न मिलेगी दुबारा!
गम की काली घटाएँ हो या खुशियों का उजाला,
खाली या भरा, पूरा हो जिंदगी का शीशाई प्याला!
रुके-रुके हो या मंज़िल की ओर तेज रफ़्तार कदम,
कुछ तुम सांझा करो, कुछ हम बाँटे खुशियाँ-गम!
रास्ते पथरीले हो या सुनी-सुनी गलियाँ काँटों भरी,
रफ़्ता-रफ़्ता कटेगी जिंदगी, पतझड़-बसंत में पौध 
हरी-भरी!

गिले-शिकवों के खुरदरे कालीन पर,
रेशमी धागों से करुं कशिदाकारी!
प्यार की मुलायम सी रजाई ओढ़,
सर्द रातों में चाँद की खातिरदारी !
कभी आँगन में ठिठुरते नीम तले,
कभी पीपल की घनी शाखों तले ,
कभी भीगी मिटटी की खुशबू में,
कभी रातरानी तले मिले गले!
तिनका-तिनका चुनते-चुनते …
पेड़ों की डालियों पर झूलते-झूलते
बिखरे फूलों की पंखुड़ियों से,
मखमली ख़्वाब सजा लूँ दिल से..
अपने ही अंश को सींचते-सींचते
आँधी, तूफानों से लड़ते-लड़ते
धरा की पथरीली-मैली सेज पर,
घोड़े बेच, दुनिया भूल पहुंडू धरा पर !

न कल की चिंता न टूटे-फूटे सपने,
न खुशनुमा बयार न शूल से अपने!
न फिर जन्म लेने की आस,
न अनबुझी, अनकही प्यास,
न परिवार के भविष्य की चिंता,
न वर्तमान की धधकती चिता,
एक ही चाहत, एक ही प्रयास,
मनुज जन्म में करू सार्थक, करूँ कर्म निर्जरा,
सत्कर्म कर, मिटाऊँ भव-भव का फेरा!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |
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