सहस्त्र किरणों से सजा अम्बर का थाल!अरुणिमा से सुशोभित मैय्या का भाल!
कैलाशपति प्रिया महागौरी करें निहाल!
आरती उतारे माँ, हिमालय पर्वत माल!
धवल वस्त्र-धारिणी, निर्मल गंगा की धार,
लाल चुन्दड, गले में ग्रह-नक्षत्रों के हार!
रत्न-जड़ित कर्णफुल, कर नर-मुंड श्रृंगार!
प्रकटो अष्टभुजाधारी! ले त्रिशूल, तलवार!
ब्रह्मस्वरूपा, योगिणी, मानिनी धीर-गंभीर!महासागर करे पद-प्रक्षालन होय अधीर!
विद्या, विवेक, वाणी, व्यवहार, विचार,
माँ भगवती! हरो दुःख, दारिद्र, दुराचार!
दशो-दिशाओं में गूंजे माँ तेरा नाद-झंकार,
तेरी कृपादृष्टी से फले-फुले जगत, संसार!
रिद्धि-सिद्धि वरदे! भरो धन-धान्य-भंडार!
भवसागर से पार लगा दे नैया है मंझधार!
खल-असुर-संहार, करो मानव धर्म रक्षा!
उठा शस्त्र कर-कमलों में, करो सृष्टी रक्षा!
महिषासुरमर्दिनी दे दो शस्त्र-शास्त्र दीक्षा
नवरात्रि में माता आँगणे पधारो दो शिक्षा!
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।