सृष्टि... नमन माँ शारदे🙏🙏
चौपाई छन्द

कल-कल बहते झरने चंचल।
हिमआच्छादित पर्वत अंचल।
बादल चूमे निश दिन अम्बर।
सृष्टि अचंभित होती क्षण भर।।

प्राची देखे कुंकुम मल-मल।
सुबह-हृदय में फैली हलचल।
भौरें करते गुंजन पल-पल।
खिलती कलियाँ निरखे खल-दल।

आग उगलता सूरज गोला।
किरणों ने नभ में मद घोला।
हौले रवि जा पश्चिम बोला।
रात-गोद में सोया भोला।।

चाँद निहारे तारे सारे।
सीने में जलते अंगारे।
बहके प्रेमी फिरते मारे।
लहरें करें शोर दुगुना रे।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं