चौपाई छन्द!
सृष्टि नियंता शम्भू भारी
गौरी उद्धारक त्रिपुरारी।
भागीरथी धरा पर उतरी।
ब्रह्म-वेद शिव अमिरस गगरी।
शशिधर मुंड माल गल सोहे।
व्याघ्रम्बर स्मशान भू मोहे।।
भस्म-राख लिप निकले भोले।
कर तांडव त्रिनेत्र जब खोले।।
डम-डम, डम-डम डमरू बोले।
हिमशिखरों का वासी डोले।।
दृष्टि-सृष्टि के घूँघट खोले ।
ताप-व्याप हर लेता भोले।।
घोल सृष्टि में सुधारस-हाला,
शिव ने पिया जहर का प्याला।
भस्म लगा तन शंकर भोले,
सुख-समृद्धि के ताले खोले।
'हर-हर महादेव' का नारा,
हरता पीड़ा तारण हारा।
डमरू, त्रिशूल धारी शंकर,
पावन प्रभु किरपा से कंकर।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र।