भाग ६१
राष्ट्रीय खेल महाकुम्भ' का आयोजन कल से शुरु होने वाला था। आज नितीन सर ने सभी खिलाडियों को तीन बजे बुलाया था। आज राज्य का नाम लिखी जर्सी भी खिलाडियों को मिलने वाली थी और खेल गाँव में पहुँचने से जुड़ी जानकारी भी सर साँझा करने वाले थे। कुछ ही समय बाद सभी को जर्सी मिल गई थी अपने-अपने माप के हिसाब से। ये बहुत ही गौरवमय पल था विभा के लिए। वह लगातार दूसरे साल यह जर्सी पहन कर बैडमिंटन में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाली थी। जैसे ही नितीन सर जरुरी काम से फ्री हुए, उन्होंने विभा को पास बुलाया और बोल पड़े," विभा! यश का अकादमी की ट्रेनिंग के लिए चयन हो गया है। तुमसे भी मुझें ढेरों उम्मीदें है। " पूरी एकाग्रता से खेलना। जीत तुम्हारी ही होगी। मेरे विश्वास पर खरी उतरोगी न? "
विभा ने सिर्फ 'हाँ' में सिर हिलाया और जाने लगी तभी नितीन सर बोल पड़े, " विभा! कल यश को कुछ पैरों के ज़ख्म के कारण अस्पताल में रखना पड़ा था और उसे डॉक्टर ने फ़ोन करने से मना किया गया है। इसलिए उसने तुम्हारे लिए मुझे सन्देश दिया हैं। उसने तुम्हें जीत की वरमाला पहन कर आने को कहा हैं मिस ब्यूटीफुल"
अब विभा खिलखिला कर हँसने लगी। मुरझाया फूल कुछ बुँदे अमिरस की मिलते ही फिर मुस्कुराने लगा। जैसे एक बच्चे को उसकी माँ से ज्यादा कोई नहीं जानता वैसे ही एक खिलाडी की खासियतें और कमियाँ उसके प्रशिक्षक से ज्यादा कोई नहीं जानता!
विभा ने वैदेही और वज्र से बात की और यश के चयन तथा चोट के बारे में भी बताया। वज्र ने विभा को तसल्ली दी और कल पूरा जी-जान से खेलने की हिदायत दी। वज्र और वैदेही ने मैच देखने आने का भी वादा किया और विभा को अब आराम करने की सलाह दी।
अप्पा का आमंत्रण पत्रिका देने का काम संपन्न हो चूका था और आज रात को वो कराड के लिये निकलने वाले थे। पद्मावती जी भी थक चुकी थी। सभी आराम करने के लिए अपने-अपने कमरे में चले गएं थे।
शाम के पांच बजने को थे और आबा का फ़ोन आया। वो अप्पा यशवंतराव जी से मिलने आना चाहते थे। अप्पा जानते थे आबा किसी न किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए ही आना चाहते होंगे। उन्होंने हाँ कह दी।
हादसे ने एक तरफ जहाँ सबकी ज़िन्दगी बदल दी थी वहीं दूसरी ऒर वक़्त के फलक पर इंसानियत के नए-नए सतरंगी मंजर पेश किएं थे। फलक वहीं, चित्र भिन्न-भिन्न!
किरदार वहीं, प्रहसन अलग-अलग!
गोधूलि बेला थी। सूर्य ने अलविदा कहने का मन बना लिया था। तपन से त्रस्त धरा को वह कुछ दिलासा देना चाहता था। कुछ समय तक मार्ग में केसरियां गेंदों की पंखुड़ियाँ उछाल कर उसने विदाई के कत्थई परिधान पहन लिए और धीरे-धीरे रात की बाहों में अपना अहंकार तज सिमट गया। रात का चेहरा भी चांदनी से दमक उठा। मधुर मिलन की रात! तन्हा दिल को सुकून पहुँचाती रात देख चाँद मुस्कुराने लगा।
ख़ामोशी को चीरते हुए दरवाजे की घंटी बजी। लाली ने फुर्ती से आकार दरवाजा खोला। विभा पीछे ही खड़ी थी। आबा के साथ वैदेही और वज्र को देख विभा फूले न समाई! आबा अप्पा के साथ दिवाणखाने में चले गए और वज्र और वैदेही विभा के साथ कमरे में!
लाली ने सबके लिए चाय-बिस्कुट तथा नमकीन पूड़ी ट्रे में सजा कर लाई और फिर रसोई के काम में लग गई। अप्पा और पदमावती जी को खाना खा कर जल्दी निकलना था। आबा ने वक़्त जाया करना उचित नहीं समझा और हॉस्पिटल की सात मंजिला ईमारत में अपने माँ-पिताजी के नाम से दो कमरे के लिए योगदान स्वरुप दान में पांच लाख रुपयों का ड्राफ्ट अप्पा में हाथ में थमाया। अप्पा को समझ में नहीं आ रहा था कि किन शब्दों में आबा का शुक्रिया अदा करें! उनके छोटे से प्रयास को सभी ने सिर्फ सराहा ही नहीं था बल्कि अपने-अपने तरीके से उसमे फूल नहीं तो फूल की पंखुड़ी के रूप में योगदान भी दिया था। वह अभिभूत थे।
ये नीली छतरीवाला भी बड़ा अजीब हैं। वैसे तो दिन-रात परीक्षा लेता रहेगा, आजमाता रहेगा इन्सान की जीवट को, नेक-नियति को लेकिन एक बार उसे विश्वास हो गया कि इस काम के पीछे उसकी नियत पाक-साफ़ हैं, लोक-कल्याणकारी हैं तो वह छप्पर फाड़ कर देने में परहेज नहीं करेगा। यहीं अप्पा की जीवन भर की कमाई थी, उनकी ईमानदारी और नेक-नियति!
आबा ने ड्राफ्ट यशवंत राव जी के हाथ में दिया, नाम की जानकारी दी और विदा ली। वज्र और वैदेही भी विभा से बात कर उसकी हौसलाअफजाई कर निकल पड़े!
एक और सितारा फलक पर अपनी रोशनी बिखेरने वाला था, चाँद की सुकूनभरी मौजूदगी में!
सभी को कल की तैयारी करनी थी। विभा को अपनी रैकेट, टॉवेल, पानी की बोतल, शूज और कपडे लेने थे तो अप्पा को कराड जाने के पहले अपने सभी कागजात समेटने थे। दान स्वरुप आएं पैसों का हिसाब-किताब भी देखना था। रात में जाना था तो ड्राइवर को गाड़ी के टायर, उनकी हवा, ब्रेक चेक करने के लिए अप्पा ने कह दिया था।
लाली अब यहीं रहने वाली थी। अभी-अभी माँ को मिल कर आई थी। न पढ़ाई हुई थी दस दिन न कोई घर में नया काम! उसकी माँ तो कह रही थी उसे अब शहर में दीदी के यहाँ तेरा क्या काम? दीदी को कोई न कोई शहर में मिल ही जायेगा काम करने के लिए! तुम यहीं रुक जाओ!
लेकिन लाली के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही थी। उसे तो अब मुम्बई की हवा लग गई थी। उसका बोलने-चलने का, उठने-बैठने का ढंग ही बदल गया था। अब गाँव उसे बहुत ही रुखा-सूखा, ठण्डा-ठण्डा, उबाऊ सा लगने लगा था। वहीं घर आँगन, खेत-खलिहान, अडोसी-पड़ोसी, हाट-बाज़ार, मेले-झूले! गाँव के इसी माहौल से कन्नी कांट कर वह आई थी मुम्बा नगरी में, स्वप्ननगरी में, अपने हिस्से के चाँद-तारें तोड़ लाने के ख़्वाब लिए! कच्ची उम्र के प्यार की खुशबू से उसके मन का कोना-कोना सुरभित हो चूका था।
विभा उसके हाव-भाव, रहन-सहन, पहनने-ओढने के ढंग-ढर्रसे अचंभित थी। कच्ची कली के फूल बनने की यह स्वाभाविक प्रक्रिया थी। लेकिन उसका जलवा उसके क्रिया-कलापों में नज़र आ रहा था और वहीं विभा की चिंता को बढ़ा रहा था।
विभा ने एक बार तो मन में सोच लिया था कि वह अप्पा को उसे साथ ले जाने को कहेगी लेकिन अगले ही पल उसने विचार किया, इसमें चिंता की क्या बात है? वक़्त के साथ-साथ परिवर्तन प्रकृति का नियम है तो फिर मैं आखिर किस कालखंड में जी रही हूं? गरीब है तो क्या उसे प्यार करने का हक़ नहीं? किसी की मुस्कुराहट देख दिल के तार झंकृत होने लगे, किसी से बात कर ऐसा लगे मानों दुनियादारी भूल कर परियों के देश में भ्रमण कर रहे है तो क्या गुनाह हो गया?
विभा का दिल और दिमाग़ एक-दूसरे से तर्क-वितर्क कर रहा था। विभा खुद को ही आश्वास्त कर रही थी। उसे डर था कि कहीं यह मासूम कली खिलने से पहले ही न मसल दी जाएं। तभी मन का दूसरा पक्ष बिफर पड़ता। क्यों हमेशा नकारात्मक सोचती हो? हो सकता है उसे भी कोई साथी मिल जाएं दुःख-दर्द बाँटने के लिए, गिले-शिकवे सुनने के लिए!
विभा अभी भी असंमजस में फंसी हुई थी। ये ऐसी पहेली थी जिसे वह जैसे-जैसे सुलझाने जाती, वैसे-वैसे और -और उलझती ही जा रही थी।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
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